Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verses 35–37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, verses 35–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 35-37
संस्कृत श्लोक
क्षणं यथार्हमन्योन्यं पूजयित्वा समेत्य च ।
ते सर्वे हृष्टमनसो महाराजनिवेशने ॥ ३५ ॥
यथोचितासनगता मिथः संवृद्धतेजसः ।
परस्परेण पप्रच्छुः सर्वेऽनामयमादरात् ॥ ३६ ॥
उपविष्टाय तस्मै स विश्वामित्राय धीमते ।
पाद्यमर्घ्यं च गां चैव भूयोभूयो न्यवेदयत् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
क्षण भर के
लिए परस्पर मिलकर ओर यथायोग्य पूजा-सत्कार कर सभीको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे राजमहल में
अपने अपने आसनं पर बैठ गये। आमने सामने बैठने से उनका तेज परस्पर बढ़ गया । वे सब आपस में
एक दूसरे से कुशल प्रश्न करने लगे । महामति विश्वामित्रजी के आसन पर बैठने के उपरान्त महाराज
दशरथ ने उनके चरण पखारे, उन्हें दूसरी बार अर्घ्य दिया, गाय दी एवं चन्दन, पुष्प, वस्त्र अलंकार,
दक्षिणा, फल ओर ताम्बूल से उनकी पुनः-पुनः पूजा की