Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verses 32–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
स राज्ञः प्रतिगृह्यार्घ्यं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ।
प्रदक्षिणं प्रकुर्वन्तं राजानं पर्यपूजयत् ॥ ३२ ॥
स राज्ञा पूजितस्तेन प्रहृष्टवदनस्तदा ।
कुशलं चाव्ययं चैव पर्यपृच्छन्नराधिपम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
महर्षि के शुभागमन से
प्रसन्नवदन महाराज दशरथ ने महर्षि की तपस्यासम्पत्ति (विपुल तप) से भयभीत होकर दूसरे के द्वारा
अर्घ्य के लिए जल मंगाने में भी अपराध की सम्भावना देखकर स्वयं जल लाकर उन्हें अर्घ्य दिया ॥ ३ १॥
महर्षि विश्वामित्र ने राजा के अर्घ्य को स्वीकार कर शास्त्र में वर्णित विधि से प्रदक्षिणा कर रहे राजा की
भूरि भूरि प्रशंसा की