Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
इदमतिमधुरं निशम्य वाक्यं श्रुतिसुखमात्मविदा विनीतमुक्तम् ।
प्रथितगुणयशागुणैर्विशिष्टं मुनिवृषभः परमं जगाम हर्षम् ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मवित् महाराज
दशरथ द्वारा विनयपूर्वक कहे गये श्रुतिमधुर सुमिष्ट वचनों को सुनकर प्रख्यातकीर्ति ओर विख्यात
गुणवाले मुनिपुंगव विश्वामित्र परम प्रसन्नता को प्राप्त हुए