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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verses 10–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, verses 10–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 10-14

संस्कृत श्लोक

अथास्थानगतं भूपं राजमण्डलमालिनम् । समुपेत्य त्वरायुक्तो याष्टीकोऽसौ व्यजिज्ञपत् ॥ १० ॥ देव द्वारि महातेजा बालभास्करभासुरः । ज्वालारुणजटाजूटः पुमाञ्छ्रीमानवस्थितः ॥ ११ ॥ सभासुरपताकान्तं साश्वेभपुरुषायुधम् । कृतवांस्तं प्रदेशं यस्तेजोभिः कीर्णकाञ्चनम् ॥ १२ ॥ वीक्ष्यमाणे तु याष्टीके निवेदयति राजनि । विश्वामित्रो मुनिः प्राप्त इत्यनुद्धतया गिरा ॥ १३ ॥ इति याष्टीकवचनमाकर्ण्य नृपसत्तमः । स समन्त्री ससामन्तः प्रोत्तस्थौ हेमविष्टरात् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज, ड्योढी पर प्रातःकाल के सूर्य के समान तेजस्वी, बड़े प्रभावशाली अग्नि की ज्वाला के तुल्य जटाजूट से सुशोभित, एक तपस्वी पुरुष खड़े हैं, जिन्होंने अपने तेज से उस प्रदेश को- ऊपर दैदीप्यमान पताका तक ओर आसपास हाथी, घोड़े, पुरुष और आयुधों तक को-सुवर्णमय बना दिया हे । महर्षि विश्वामित्रजी आये हैं । - ऐसा विनम्र वाणी से महाराज से कह रहे प्रधान यष्टिधारी के देखते ही उसके वचन सुनकर मन्त्रियों ओर सामन्तो के साथ महाराज सुवर्णं के सिंहासन से उठ खड हुए