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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verse 51

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

त्वामिहाभ्यागतं दृष्ट्वा प्रतिपूज्य प्रणम्य च । आत्मन्येव नमाम्यन्तर्दृष्ट्वेन्दुं जलधिर्यथा ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

यहाँ आये हुए आपके दर्शन कर, पूजा कर और प्रणाम कर, जैसे चन्द्रमा को देखकर समुद्र अपने में नहीं समाता, तटसीमा को लाँघकर उछल पडता है, वैसे ही मैं भी अपने में फूला नहीं समा रहा हूँ