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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

वसिष्ठेन समागम्य प्रहस्य मुनिपुंगवः । यथार्हं चार्चयित्वैनं पप्रच्छानामयं ततः ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा दशरथ द्वारा पूजित विश्वामित्र बड़े प्रसन्न हुए । उनका मुखकमल खिल उठा । उन्होने राजा से उनकी तथा राज्य के विभिन्न अंगो की कुशल पूछी ओर पूछा : आपका राजकोष तो परिपूर्णं है ? ॥३ ३॥ तदन्तर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजी ने प्रसन्नतापूर्वक महर्षि वसिष्ठजी से मिलकर वसिष्ठजी की पूजा की और उनसे यथायोग्य उनके शिष्य, आश्रम के मृग, पक्षी आदि की कुशल पूछी