रिपोर्ट हाथ में है, डॉक्टर ने देखकर कह दिया कि सब ठीक है, फिर भी हम किसी दूसरे डॉक्टर को दिखाने चले जाते हैं। जानकारी पूरी है, बस भरोसा अधूरा है। जानने और उस पर टिक जाने के बीच का यह फ़ासला बहुत छोटा दिखता है, पर कई बार पूरी उम्र उसी में निकल जाती है।

पिछली कड़ी में राम ने अयोध्या की सभा में अपना सवाल रखा था और चुप हो गए थे। सबको लगा था कि अब उत्तर मिलेगा। पर विश्वामित्र ने उत्तर देने से पहले एक कथा सुनाई। कथा व्यास के पुत्र शुकदेव की है, और राम से विश्वामित्र ने साफ़ कहा, "यह तुम्हारी ही कहानी जैसी है।"

यह प्रसंग मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण के पहले और दूसरे सर्ग में है। प्रकरण का नाम ही बताता है कि यहाँ से बात मुमुक्षु की, यानी मुक्ति चाहने वाले की होती है: वह कैसा हो, उसे क्या चाहिए। नीचे जो लिखा है, वह मूल ग्रंथ के क्रम के अनुसार है, बस कहने का ढंग मेरा है।

कथा एक नज़र में

ग्रंथ श्री योगवासिष्ठ महारामायण, मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण, सर्ग १–२
कौन सुना रहा है विश्वामित्र, अयोध्या की सभा में राम को
मुख्य पात्र शुकदेव (व्यास के पुत्र), विदेह के राजा जनक, व्यास
समस्या शुक ने सत्य अपने विचार से जान लिया था, पर "यही है" यह भरोसा नहीं जमा
जनक की परीक्षा सात दिन ड्योढ़ी पर, सात दिन आँगन में, सात दिन अंतःपुर के भोग में
परिणाम जनक ने वही बात दोहराकर शुक का निश्चय पक्का किया, और शुक शांत होकर मेरु पर समाधि में लीन हुए
मुख्य शिक्षा वासनाओं का क्षीण होना ही मोक्ष है, और उनका दृढ़ होना बंधन (मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण, सर्ग २, श्लोक ५)

जिसे सब पता था

विश्वामित्र ने बात राम की तारीफ़ से शुरू की। "राघव, तुम्हें अब और कुछ जानना बाकी नहीं है। अपनी बुद्धि से तुम सब समझ चुके हो। बस दर्पण पर ज़रा-सी धूल है, उसे पोंछना भर है।"

राम ने पूछा, "शुकदेव को सत्य पहले पता था, फिर भी उन्हें विश्राम क्यों नहीं मिला? और बाद में कैसे मिला?"

विश्वामित्र ने उत्तर देने से पहले सभा में एक ओर इशारा किया। "ये जो तुम्हारे पिता के बगल में सोने के आसन पर बैठे हैं, सूर्य जैसे तेजस्वी, ये भगवान व्यास हैं। शुक इन्हीं के पुत्र थे।" यानी जिस पिता की कहानी सुनाई जा रही थी, वह उसी सभा में बैठा सुन रहा था।

शुक भी राम की तरह इस संसार के बारे में मन ही मन बहुत सोचते थे। उसी सोच से उनमें विवेक जागा, और लंबे समय तक विचार करते-करते वे उस सत्य तक पहुँच गए जिसे परमात्मा कहते हैं। किसी गुरु ने उन्हें बताया नहीं था। उन्होंने खुद पाया था। फिर भी:

स्वयं प्राप्ते परे वस्तुन्यविश्रान्तमनाः स्थितः ।
इदं वस्त्विति विश्वासं नासावात्मन्युपाययौ ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण / सर्ग १, श्लोक ११

अर्थ: परम तत्त्व को स्वयं पा लेने पर भी उनका मन विश्राम नहीं पा सका। "यही वह वस्तु है", यह विश्वास उनके भीतर नहीं जमा।

भोगों से उनका मन वैसे ही हट गया था जैसे चातक पक्षी बारिश की आम धाराओं से मुँह फेर लेता है। यानी वैराग्य था, समझ भी थी। कमी बस एक चीज़ की थी: उस समझ पर भरोसे की।

"यह तो मैं पहले से जानता था"

एक दिन मेरु पर्वत पर, एकांत में बैठे पिता से शुक ने बड़ी श्रद्धा से पूछा, "यह संसार का आडंबर किस क्रम से खड़ा हुआ? यह शांत कैसे होता है? कितना बड़ा है, कब तक रहेगा, और है किसका?"

व्यास आत्मज्ञानी थे। उन्होंने जो कहना था, शुरू से अंत तक ठीक-ठीक कह दिया। पर बेटे की प्रतिक्रिया वह नहीं थी जिसकी किसी पिता को उम्मीद होती है।

आज्ञासिषं पूर्वमेतदहमित्यथ तत्पितुः ।
स शुकः शुभया बुद्ध्या न वाक्यं बह्वमन्यत ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण / सर्ग १, श्लोक १६

अर्थ: "यह सब तो मैं पहले से जानता था", यह सोचकर शुक ने अपनी शुद्ध बुद्धि से पिता के वचन को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया।

इसमें घमंड नहीं था। जो बात पहले से पता हो, उसे दोबारा सुनकर भीतर कुछ नहीं बदलता। शुक को नई जानकारी नहीं चाहिए थी, और व्यास के पास देने को नई जानकारी थी भी नहीं, क्योंकि सत्य एक ही है।

व्यास बेटे का मन समझ गए। फिर उन्होंने जो कहा, वह पढ़कर मैं हर बार रुक जाता हूँ: "मैं इस तत्त्व को ठीक से नहीं जानता। धरती पर जनक नाम के एक राजा हैं, वे जानने योग्य को ठीक-ठीक जानते हैं। उनसे तुम्हें सब मिल जाएगा।"

सात दिन ड्योढ़ी पर

पिता की बात मानकर शुक सुमेरु से धरती पर उतरे और जनक की नगरी विदेह पहुँचे। द्वारपालों ने राजा को ख़बर दी, "महाराज, व्यास जी के पुत्र शुकदेव द्वार पर खड़े हैं।"

जनक ने बड़ी बेपरवाही से कहा, "अच्छा, आए हैं तो रहें।" और फिर सात दिन तक कुछ नहीं कहा।

टीकाकार यहाँ एक काम की बात बताते हैं। जनक शुक के बारे में सुन चुके थे। उन्हें पता था कि शुक ने अपने पिता की बात को भी "पहले से पता है" कहकर टाल दिया था। अगर वे भी तुरंत उपदेश दे देते, तो उसका भी वही हाल होता। इसलिए पहले उन्होंने परखा कि सुनने वाला सुनने के लिए तैयार है भी या नहीं।

सात दिन बाद शुक को आँगन में आने दिया गया। वहाँ भी वे पूरे सात दिन उसी तरह बैठे रहे। अनादर की ओर उनका ध्यान ही नहीं गया। मन में बस एक ही चाह थी, सत्य को जानने की।

अंतःपुर के सात दिन

फिर जनक ने शुक को अंतःपुर में बुलवा लिया, और बहाना यह बनाया कि जब तक भोजन आदि से आपका सत्कार नहीं हो जाता, तब तक राजा से भेंट नहीं होगी। अब सात दिन तक उल्टी परीक्षा चली। यौवन के मद में डूबी सुंदर स्त्रियाँ, तरह-तरह के पकवान, हर तरह का भोग। जो ड्योढ़ी पर उपेक्षित बैठा था, उसकी अब हर तरह से ख़ातिर हो रही थी।

ते भोगास्तानि दुःखानि व्यासपुत्रस्य तन्मनः ।
नाजह्रुर्मन्दपवना बद्धपीठमिवाचलम् ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण / सर्ग १, श्लोक २५

अर्थ: वे भोग और वे दुःख व्यास-पुत्र के मन को वैसे ही नहीं डिगा सके, जैसे धीमी हवा गहरी नींव वाले पर्वत को नहीं हिला सकती।

ग्रंथ कहता है कि शुक वहाँ पूरे चाँद की तरह बैठे रहे। सुख और अनादर, दोनों में एक जैसे। शांत, मौन, प्रसन्न।

तीनों परीक्षाओं को साथ रखकर देखें तो एक बात दिखती है। अपमान में आदमी चिढ़ जाता है, इंतज़ार में ऊब जाता है, और सुविधा में फिसल जाता है। जनक ने तीनों दिशाओं से धक्का देकर देखा। तब जाकर उन्होंने शुक को अपने पास बुलाया, और जो राजा इक्कीस दिन तक मिला तक नहीं था, उसने उन्हें देखते ही प्रणाम किया।

फिर बोले, "आपने जीवन में जो करना था, सब कर लिया। आपकी सारी इच्छाएँ पूरी हो चुकी हैं। अब आप क्या चाहते हैं?"

"क्या सचमुच यही है?"

शुक ने वही प्रश्न दोहराया जो मेरु पर पिता से पूछा था: "गुरुदेव, यह संसार कैसे उठा और कैसे शांत होता है?"

और जनक ने वही उत्तर दिया जो व्यास ने दिया था। एक शब्द भी नया नहीं।

इस बार शुक ने उसे टाला नहीं। उन्होंने अपना मन खोलकर रख दिया: "यह बात मैंने पहले अपने विवेक से जानी थी। पिताजी से पूछा, तो उन्होंने भी यही कहा। आप भी यही कह रहे हैं, और शास्त्रों में भी यही दिखता है कि यह संसार अपनी ही कल्पना से उठता है और कल्पना के मिटते ही मिट जाता है। तो क्या सचमुच यही सत्य है? मुझे पक्का बताइए। मेरा मन संसार में भटक रहा है। आपसे ही विश्राम मिलेगा।"

मुझे लगता है कि पूरी कथा का असली मोड़ यही है। शुक का सवाल अब बदल चुका था। पहले वे पूछ रहे थे कि सत्य क्या है। अब पूछ रहे थे कि क्या यही है। पहला सवाल जानकारी का था, दूसरा भरोसे का।

अपने ही संकल्प से बँधा

जनक का उत्तर छोटा और साफ़ था: "मुनिवर, इससे आगे कोई निश्चय नहीं है। जो आपने स्वयं जाना और फिर गुरु से सुना, वही अंतिम है।"

अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् ।
स्वसंकल्पवशाद्बद्धो निःसंकल्पश्च मुच्यते ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण / सर्ग १, श्लोक ३६

अर्थ: यहाँ बस एक ही अखंड चैतन्य आत्मा है, दूसरा कुछ नहीं। वह अपने ही संकल्प के कारण बँधता है और संकल्प से रहित होते ही मुक्त हो जाता है।

फिर जनक ने वह कहा जो शायद शुक को सबसे ज़्यादा सुनने की ज़रूरत थी। "भोग भोगने से पहले ही आपका मन उनसे हट गया। आप बालक हैं, पर वैराग्य में महावीर हैं। आपके पिता ज्ञान के महासागर हैं, फिर भी जो पूर्णता आपमें आई है, वह उनमें नहीं आई। मैं व्यास का शिष्य हूँ, पर उनके पुत्र को शिष्य बनाकर उनसे बड़ा हो गया हूँ। और भोगों की इच्छा इतनी कम होने के कारण आप मुझसे भी बड़े हैं।"

और अंत में: "आपको जो पाना था, पा लिया। आप दृश्य में नहीं गिरते। आप मुक्त हैं। अब यह भ्रम छोड़ दीजिए कि कुछ और जानना बाकी है।"

टीका कहती है कि यह सारी प्रशंसा शुक का निश्चय पक्का करने के लिए थी। जनक ने शुक को कोई नई जानकारी नहीं दी। उन्होंने तीन हफ़्ते परखकर बस इतना कहा कि तुम पहुँच चुके हो। कभी-कभी आदमी को उत्तर नहीं, गवाह चाहिए होता है।

बूँद और सागर

जनक के इतना कहते ही शुक चुपचाप उस निर्मल परम तत्त्व में टिक गए। शोक, भय और भटकन, सब चले गए। इच्छा न जाने कहाँ गई। सारे संशय कट गए।

फिर वे मेरु के शिखर पर समाधि के लिए चले गए। वहाँ दस हज़ार वर्ष तक निर्विकल्प समाधि में रहे और जैसे बिना तेल का दीया अपने-आप शांत हो जाता है, वैसे ही परमात्मा में शांत हो गए।

सर्ग का आख़िरी श्लोक कहता है कि वासनाएँ गल गईं, और वे वैसे ही एक हो गए जैसे पानी की बूँद सागर में मिल जाती है।

राम के लिए इसका अर्थ

कथा पूरी करके विश्वामित्र सभा में बैठे मुनियों की ओर मुड़े। "शुक को बस इतना ही चाहिए था कि मन का ज़रा-सा मैल पुँछ जाए। राम को भी इतना ही चाहिए।"

फिर उन्होंने राम की असली पहचान बताई। राम ने जानने योग्य को जान लिया है, और इसका प्रमाण यह है कि भोग उन्हें रोग जैसे लगते हैं। जिसने सत्य जान लिया, उसके मन का यही लक्षण है। इसी के साथ विश्वामित्र ने वह बात कही, जो योग वासिष्ठ के सबसे ज़्यादा दोहराए जाने वाले विचारों में से है:

वासनातानवं राम मोक्ष इत्युच्यते बुधैः ।
पदार्थवासनादार्ढ्यं बन्ध इत्यभिधीयते ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण / सर्ग २, श्लोक ५

अर्थ: राम, ज्ञानी लोग वासनाओं के क्षीण हो जाने को ही मोक्ष कहते हैं, और विषयों की वासना के दृढ़ होने को बंधन।

अगले श्लोक में वे एक और खरी बात जोड़ते हैं: आत्मा की झलक तो मनुष्य को थोड़े प्रयास से भी मिल जाती है, पर विषयों से अरुचि बड़ी कठिनाई से आती है। और जिसे यश या किसी और लाभ की चाह के बिना ही भोग अच्छे न लगें, उसी को जीवन्मुक्त कहते हैं।

इसलिए विश्वामित्र ने वसिष्ठ से प्रार्थना की कि वे वह युक्तिपूर्ण ज्ञान राम को सुनाएँ, जो कभी निषध पर्वत पर स्वयं ब्रह्मा ने दिया था। वसिष्ठ ने हामी भरी: "जैसे दीपक रात का अँधेरा हटाता है, वैसे ही मैं इन राजकुमारों के मन का अँधेरा ज्ञान से हटाऊँगा।"

यहीं से वसिष्ठ जी का उपदेश शुरू होता है। वह इस सीरीज़ की अगली कड़ियों में।

मूल संदेश

यह कथा जानने और विश्राम पाने के बीच का फ़र्क दिखाती है। शुक का ज्ञान ग़लत नहीं था। जनक ने उसमें कुछ जोड़ा भी नहीं। फिर भी जनक से मिलने के बाद शुक शांत हो गए, और पहले नहीं हुए थे।

फ़र्क दो चीज़ों से आया। पहली, संवाद: अपना विचार, गुरु का वचन और शास्त्र, तीनों एक ही बात कहें, तब संदेह की जड़ कटती है। दूसरी, परीक्षा: जनक ने उपदेश देने से पहले देखा कि शुक का वैराग्य अपमान, प्रतीक्षा और सुख, तीनों में टिकता है या नहीं। जो वैराग्य परखा न गया हो, उस पर खड़ा ज्ञान भी डगमगाता रहता है।

और विश्वामित्र की कसौटी इसे पूरा करती है। ज्ञान इस बात से नहीं मापा जाता कि आप कितना जानते हैं, बल्कि इससे कि चीज़ें आपको कितना कम खींचती हैं। वासना जितनी पतली, बंधन उतना ढीला।

जानने से विश्राम तक — शुक का अपना ज्ञान, अविश्वास, व्यास का उपदेश, जनक की तीन परीक्षाएँ, और फिर विश्वास और विश्राम

जीवन में उपयोग

हममें से बहुत लोग शुक वाली हालत में जीते हैं, बस छोटे पैमाने पर। हमें पता होता है कि क्या करना ठीक है, फिर भी हम एक और किताब, एक और वीडियो, एक और सलाह ढूँढ़ते रहते हैं। अक्सर कमी जानकारी की नहीं होती, भरोसे की होती है।

ऐसे में पहले यह लिखकर देखिए कि आप असल में क्या जानते हैं। कई बार लिखते ही पता चल जाता है कि उत्तर तो आपके पास पहले से है।

फिर किसी ऐसे व्यक्ति से बात कीजिए जिसने वह बात जीकर देखी हो, सिर्फ़ पढ़ी न हो। शुक जनक के पास कुछ नया सुनने नहीं गए थे। उन्हें एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जिसकी बात पर वे टिक सकें।

और जनक वाली परीक्षा अपने ऊपर आज़माइए, दूसरों पर नहीं। जब कोई अनदेखा करे, जब किसी चीज़ का लंबा इंतज़ार करना पड़े, और जब सब कुछ आराम से मिल रहा हो, तीनों हालात में अपने मन को देखिए। अगर मन डगमगाता है, तो इसमें शर्म की बात नहीं। इसका मतलब बस इतना है कि वासनाएँ अभी बाकी हैं, और काम अभ्यास का है, नए गुरु की तलाश का नहीं। अगर मन टिका रहता है, तो जनक की सलाह मानिए: खोज बंद कीजिए और यह भ्रम छोड़ दीजिए कि अभी कुछ और जानना बाकी है।

जानते हैं, फिर भी बेचैन हैं — एक व्यावहारिक क्रम

लेखक का मत

मुख्य शब्द

शब्द अर्थ Meaning
विश्रान्ति मन का सत्य में टिक जाना, भीतर की भटकन का रुकना Inner rest; the mind settling in what it knows
विश्वास "यही है", ऐसा दृढ़ निश्चय Firm conviction that "this is it"
वासना भोगों और विषयों की ओर खींचने वाले गहरे संस्कार Latent desire; deep tendencies that pull toward objects
वासनाक्षय वासनाओं का क्षीण हो जाना, जिसे योग वासिष्ठ मोक्ष कहता है Thinning away of latent desires; liberation itself
संकल्प मन की कल्पना और चाह, जिससे बंधन बनता है Mental willing and imagining that creates bondage
जीवन्मुक्त जो शरीर रहते ही मुक्त है One liberated while still living
निर्विकल्प समाधि वह समाधि जिसमें कोई विचार या भेद नहीं रहता Absorption free of all thought and distinction
मुमुक्षु मुक्ति की तीव्र इच्छा रखने वाला One who earnestly seeks liberation

Sources