Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 2
पहला सर्ग समाप्त दूसरा सर्ग श्रीरामचन्द्रजी को उपदेश देने के लिए प्रार्थित श्रीवसिष्ठजी को श्री विश्वामित्रजीका प्रोत्साहित करना ।
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- Verse 1श्रीशुकदेवजी की आख्यायिका की प्रकृत में संगति दिखला रहे एवं श्रीरामचन्द्रजी को उपदेश देने…
- Verses 2–3पूर्वोक्त बात का ही सम्पूर्ण मुनियों की सम्मति से समर्थन करने के लिए “मुनीश्वराः” सव मुनि…
- Verses 4–8हे राम, विद्वान लोग वासनाक्षय को "मोक्ष" कहते हैं और विषयों में वासना की दृढता को बन्ध कह…
- Verse 9वैराग्य, बोध ओर उपरति की अभिवृद्धि मे वैराग्य आदि परस्पर सहायक हैं, अतः ज्ञान के अतिशय पर…
- Verse 10इस प्रकार व्यतिरेकप्रकर्ष से अन्वयप्रकर्ष लक्षित होता है, अर्थात् ज्ञातव्य तत्त्व का ज्ञ…
- Verse 11यदि श्रीरामचन्द्रजी तत्त्वज्ञानी हैं, तो उन्हें उपदेश देने के लिए श्रीवसिष्ठजी की वक्ष्यम…
- Verses 12–13जैसे शरत्काल की शोभा मेघरहित निर्मल आकाशमात्र की अपेक्षा करती है वैसे ही शरत्-शोभा के सम…
- Verses 14–18यदि प्रश्न हो कि आप ही उपदेश क्यो नहीं देते ? तो इस पर कहते हैं। ये महात्मा सम्पूर्ण रघुव…
- Verses 19–20अल्पफल देनेवाला महान् परिश्रम नहीं है। श्रीरामचन्द्रजी निष्पाप हैं, अत: जैसे निर्मल दर्प…
- Verses 21–23पात्र में यदि उसका दान न किया जाय, तो व्यर्थ होने के कारण वह निन्दनीय ही होगा, यह भाव है…
- Verse 24श्रीविश्वामित्रजी के यों कहने पर व्यास, नारद आदि सम्पूर्ण मुनियोंने भी उनके कथन की साधुवा…
- Verses 25–27श्रीवसिष्ठजी ने कहा : मुनिवर, जिस कार्य के लिए आप मुझे अदेश देते हैं, उसे मैं निर्विघ्न क…
- Verse 28वाल्मीकिजी ने कहा : महात्मा श्रीवसिष्ठजी यों स्पष्टतया प्रतिज्ञा कर जैसे पहलवान् या नट भ…