Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verses 6–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, verses 6–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 6- 14
संस्कृत श्लोक
विश्वामित्र उवाच ।
आत्मोदन्तसमं राम कथ्यमानमिदं मया ।
श्रृणु व्यासात्मजोदन्तं जन्मनामन्तकारणम् ॥ ६ ॥
योऽयमञ्जनशैलाभो निविष्टो हेमविष्टरे ।
पार्श्वे तव पितुर्व्यासो भगवान्भास्करद्युतिः ॥ ७ ॥
अस्याभूदिन्दुवदनस्तनयो नयकोविदः ।
शुको नाम महाप्राज्ञो यज्ञो मूर्त्येव सुस्थितः ॥ ८ ॥
प्रविचारयतो लोकयात्रामलमिमां हृदि ।
तवेव किल तस्यापि विवेक उद्भूदयम् ॥ ९ ॥
तेनासौ स्वविवेकेन स्वयमेव महामनाः ।
प्रविचार्य चिरं चारु यत्सत्यं तदवाप्तवान् ॥ १० ॥
स्वयं प्राप्ते परे वस्तुन्यविश्रान्तमनाः स्थितः ।
इदं वस्त्विति विश्वासं नासावात्मन्युपाययौ ॥ ११ ॥
केवलं विररामास्य चेतो विगतचापलम् ।
भोगेभ्यो भूरिभङ्गेभ्यो धाराभ्य इव चातकः ॥ १२ ॥
एकदा सोऽमलप्रज्ञो मेरावेकान्तसुस्थितम् ।
पप्रच्छ पितरं भक्त्या कृष्णद्वैपायनं मुनिम् ॥ १३ ॥
संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं मुने ।
कथं च प्रशमं याति कियत्कस्य कदेति वा ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीविश्वामित्रजी ने कहा : हे
रामचन्द्र, मैं तुमसे श्रीव्यासजी के पुत्र शुकदेवजी का जीवनवृत्तान्त कहता हूँ, तुम इसे सुनो यह
तुम्हारे जीवनवृत्तान्त के तुल्य है और सुननेवालों के मोक्ष का कारण है। जो ये अंजन पर्वत के सदृश
और सूर्य के समान तेजस्वी श्रीव्यासदेवजी तुम्हारे पिताजी के बगल में सुवर्ण के आसन पर बैठे हैं,
इनका चन्द्रमा के समान सुन्दर, महाबुद्धिमान, सर्वशास्त्रज्ञ और मूर्तिमान् यज्ञ के सदुश शुकदेवनामक
पुत्र हुआ। तुम्हारे समान अपने हृदय में सदा बारबार इस लोकयात्रा का (संसारस्थिति का) विचार कर
रहे उनके हृदय में भी ऐसा ही विवेक उत्पन्न हुआ । वे महामनस्वी श्रीशुकदेवजी अपने उस विवेक से
चिरकाल तक भलीभाँति विचारकर परमार्थसत्यरूप अद्वितीय, चिद्घन परमात्मतत्त्व को प्राप्त हो गये ।
स्वयं प्राप्त परमात्मतत्त्वरूप वस्तु में उनका मन विश्रान्त नहीं हुआ, उन्हें आत्मतत्त्व में, यही वस्तु है,
ऐसा विश्वास नहीं हुआ विश्वास न होने से विश्रान्ति भी नहीं मिली । विश्रान्ति न मिलने में अविश्वास
ही कारण हे जैसे वर्षा की भिन्न जलधाराओं में चातक प्रीति नहीं करता, उनसे विरत रहता है, वैसे ही
केवल उनका मन चंचलता का त्यागकर जन्म-मरणरूपी महान दुःख के कारण विषयभोगो से विरक्त
हो गया । एक समय निर्मलमति शुकदेवजी ने मेरु पर्वतपर एकान्त स्थान में बैठे हुए अपने पिता
श्रीकृष्णद्रैपायनजी से बड़े भक्ति-भाव के साथ पूछा : पूज्यतम, यह संसाररूप आडम्बर (०३) किस
क्रम से उत्पन्न हुआ, कब यह उच्छिन्न होता है, यह कितना बड़ा है, कितने काल तक रहेगा ओर यह
संसार है किसका ? क्या देह का है या इन्द्रियों काहे या मन का है अथवा प्राण का है या देहेन्द्रियादिसंघात
का है या उनसे अन्य विकारी का है अथवा निर्विकार चिन्मात्र का है ?