Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verses 15–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, verses 15–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 15-18

संस्कृत श्लोक

इति पृष्टेन मुनिना व्यासेनाखिलमात्मजे । यथावदमलं प्रोक्तं वक्तव्यं विदितात्मना ॥ १५ ॥ आऽज्ञासिषं पूर्वमेतदहमित्यथ तत्पितुः । स शुकः शुभया बुद्ध्या न वाक्यं बह्वमन्यत ॥ १६ ॥ व्यासोऽपि भगवान्बुद्धवा पुत्राभिप्रायमीदृशम् । प्रत्युवाच पुनः पुत्रं नाहं जानामि तत्त्वतः ॥ १७ ॥ जनको नाम भूपालो विद्यते वसुधातले । यथावद्वेत्त्यसौ वेद्यं तस्मात्सर्वमवाप्स्यसि ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

पुत्र द्वारा यों पूछे जाने पर आत्मतत्त्वज्ञ महामुनि श्रीव्यासजी ने अपने पुत्र से सम्पूर्णं वक्तव्य आद्योपान्त भलीभाँति कहा । पिताजी के उपदेश के अनन्तर श्री शुकदेवजी ने यह सब तो मैं पहले ही जानता था, इससे कुछ अपूर्वं बात नहीं ज्ञात हुई, यह सोचकर पिताजी के वाक्य का शुभबुद्धि से विशेष आदर नहीं किया ।भगवान्‌ व्यासदेवजी ने भी पुत्रका ऐसा अभिप्राय जानकर उनसे फिर कहा : मैं उक्त तत्त्व से अतिरिक्त तत्त्व को नहीं जानता । पृथिवी में जनक नाम के महाराज हैं, वे ज्ञातव्य तत्त्व को भलीभाँति जानते हैं, उनसे तुम वेद्य (जानने योग्य) आत्मतत्त्व को भलीभाँति जान जाओगे