किसी घर में जवान होता बेटा अचानक चुप रहने लगे, थाली आधी छोड़कर उठ जाए और पूछने पर बस इतना कहे कि "कुछ नहीं हुआ", तो माँ-बाप की नींद उड़ जाती है। अयोध्या के राजमहल में एक समय ठीक यही हुआ था। फ़र्क बस इतना था कि वह बेटा राम थे।

योग वासिष्ठ किसी युद्ध या चमत्कार से शुरू नहीं होता। वह शुरू होता है एक किशोर की उदासी से। हज़ारों श्लोकों में फैला वसिष्ठ जी का पूरा उपदेश असल में इसी उदासी का उत्तर है। इसलिए इस कथा-सीरीज़ की पहली कड़ी भी यहीं से।

यह प्रसंग वैराग्य प्रकरण के तीसरे सर्ग से तैंतीसवें सर्ग तक फैला है। पूरी कथा वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज को सुना रहे हैं। नीचे जो लिखा है, वह मूल ग्रंथ के क्रम और प्रसंगों के अनुसार ही है, बस कहने का ढंग मेरा है।

तीर्थयात्रा से लौटे राजकुमार

राम की उम्र तब सोलह भी पूरी नहीं हुई थी। गुरु वसिष्ठ ने साथ में शास्त्र जानने वाले ब्राह्मण भेजे, माताओं ने बार-बार गले लगाकर विदा किया, और राम भाइयों के साथ तीर्थयात्रा पर निकल पड़े।

गंगा, यमुना, सरस्वती, प्रयाग, नैमिषारण्य, गया, काशी, केदार, पुष्कर, मानसरोवर... ग्रंथ में जगहों की सूची इतनी लंबी है कि पढ़ते-पढ़ते साँस फूलने लगती है। चारों समुद्रों के किनारे, हिमालय और विंध्य के जंगल, ऋषियों के आश्रम। लगता है वाल्मीकि यह जताना चाहते हैं कि राम ने दुनिया को ठीक से, आँख भरकर देखा था।

लौटे तो अयोध्या ने फूल बरसाए। आठ दिन तक उत्सव चला। फिर जीवन अपनी लय में आ गया: सुबह स्नान-संध्या, पिता के दर्शन, एक पहर वसिष्ठ जी के पास सत्संग, फिर पिता से अनुमति लेकर शिकार, और शाम को मित्रों के साथ भोजन। एक राजकुमार के लिए इससे अच्छी दिनचर्या और क्या होती।

पर कुछ समय बाद यह लय टूटने लगी।

"पिताजी, मुझे कुछ दुःख नहीं है"

ग्रंथ यहाँ एक बहुत सुंदर उपमा देता है। जैसे शरद ऋतु में साफ़ पानी वाला तालाब दिन-ब-दिन सूखता जाता है, वैसे ही राम दिन-ब-दिन दुबले होने लगे। कमल जैसा चेहरा पीला पड़ गया। वे पद्मासन में बैठे रहते, गाल हथेली पर टिकाए, किसी से कुछ न बोलते। सेवक बहुत कहते, तब जाकर किसी तरह स्नान और संध्या कर लेते।

लक्ष्मण और शत्रुघ्न, जो हर बात में राम के पीछे चलते थे, इसमें भी पीछे चल पड़े। देखते-देखते तीनों भाई एक जैसे उदास हो गए।

दशरथ बार-बार पूछते, "बेटा, तुम्हें कौन-सी चिंता है?" और राम हर बार एक ही उत्तर देते, "पिताजी, मुझे कुछ भी दुःख नहीं है।" फिर चुपचाप जाकर पिता की गोद में बैठ जाते।

इस पूरे प्रसंग में यह दृश्य मुझे सबसे ज़्यादा छूता है। बेटा कुछ बता नहीं पा रहा, पर पिता से दूर भी नहीं जाना चाहता। शायद उसके पास बताने को शब्द ही नहीं थे। जो बेचैनी भीतर थी, उसका नाम अभी उसे खुद नहीं पता था।

हारकर दशरथ ने वसिष्ठ से पूछा। गुरु ने कुछ देर सोचा और बस इतना कहा, "राजन्, इसके पीछे कारण है, पर आप दुःखी न हों।" साथ में यह भी जोड़ा कि सत्पुरुष छोटी-मोटी बातों से न क्रोध करते हैं, न उदास होते हैं। मतलब साफ़ था: जो हो रहा है, वह कोई छोटी बात नहीं है।

द्वार पर विश्वामित्र

उन्हीं दिनों द्वारपाल हड़बड़ाते हुए सभा में पहुँचे। ड्योढ़ी पर एक तपस्वी खड़े थे। जटाएँ आग की लपट जैसी, और ऐसा तेज कि आसपास खड़े हाथी-घोड़े तक सुनहरे दिखने लगे थे। गाधि के पुत्र विश्वामित्र आए थे।

दशरथ सिंहासन छोड़कर पैदल ही उनकी ओर चल पड़े। झुककर प्रणाम किया तो मुकुट की मणियाँ ज़मीन पर बिखर गईं। स्वागत में उन्होंने इतनी उपमाएँ दीं कि पढ़कर मुस्कान आ जाती है: जैसे अंधे को आँखें मिल जाएँ, जैसे लंबे सूखे के बाद किसान को बारिश मिल जाए। और फिर वह वाक्य, जो किसी राजा को सोच-समझकर ही बोलना चाहिए: "आप जो भी काम लेकर आए हैं, समझिए वह हो गया।"

विश्वामित्र ने राम को माँगा। उनके यज्ञ को राक्षस बार-बार मांस और रक्त से अपवित्र कर देते थे। शाप देकर वे उन्हें रोक सकते थे, पर शाप के लिए क्रोध चाहिए, और यज्ञ क्रोध में नहीं होता। इसलिए वे राम को लेने आए थे, बस दस दिन के लिए।

एक राजा, जो उस दिन सिर्फ़ पिता था

दशरथ एक क्षण के लिए चित्र की तरह जड़ हो गए। फिर जो बोले, वह किसी राजा की नहीं, एक पिता की आवाज़ थी: "मुनिवर, राम अभी सोलह का भी नहीं हुआ। उसने महल के आँगन में खेल-खेल की लड़ाई के सिवा कोई रणभूमि नहीं देखी। और आजकल तो वह ठीक से खाता भी नहीं, किसी भीतरी दुःख से चुप बैठा रहता है। ऐसे बच्चे को राक्षसों से लड़ने कैसे भेज दूँ? मेरी पूरी सेना ले जाइए, मैं खुद आपके साथ चलता हूँ।"

उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि बरसों की प्रतीक्षा के बाद ये चार बेटे मिले हैं, और राम के बिना वे जी नहीं पाएँगे।

विश्वामित्र भड़क उठे। "वचन देकर पीछे हट रहे हो? सिंह होकर हिरन बनना चाहते हो? ठीक है, जैसे आया था वैसे ही लौट जाता हूँ।" ग्रंथ कहता है कि उनके क्रोध से धरती काँप उठी। तब वसिष्ठ ने बात सँभाली। उन्होंने दशरथ को रघुकुल की मर्यादा याद दिलाई और समझाया कि विश्वामित्र साथ हों तो राम का कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता।

दशरथ मान गए और राम को बुलाने प्रतिहार भेजा। पर प्रतिहार अकेला लौटा। उसके साथ राम का एक निजी सेवक था, और उसने जो बताया, उससे सभा सन्न रह गई।

सेवक की ज़बानी

"महाराज, जब से वे तीर्थयात्रा से लौटे हैं, ऐसे ही हैं। बहुत कहने पर कभी भोजन कर लेते हैं, कभी वह भी नहीं। गहने उन्हें अच्छे नहीं लगते। नृत्य देखकर कहते हैं, ये सब क्या कर रही हैं? अपना धन माँगने वालों में बाँट देते हैं। कोई कह दे कि आप तो सम्राट हैं, तो उसकी बात को पागल का प्रलाप समझकर हँस देते हैं।"

"अकेले में नदी किनारे या किसी सुनसान जगह बैठे रहते हैं। न हँसते हैं, न रोते हैं। कोई पूछे तो एक ही उत्तर: 'कुछ नहीं।' और कभी-कभी धीमे स्वर में गाते हैं कि हमने परम पद पाए बिना अपनी उम्र यों ही गँवा दी।"

सेवक की एक बात मुझे बहुत सटीक लगती है। वह कहता है, राम न मूढ़ हैं, न मुक्त। मूढ़ इसलिए नहीं कि उनमें विवेक जाग गया है और उन्हें सब कुछ नश्वर दिखने लगा है। मुक्त इसलिए नहीं कि भीतर अभी विश्राम नहीं मिला। वे बीच में अटके हैं। एक किनारा छूट गया है, दूसरा अभी दिखा नहीं।

"यह मोह नहीं, बोध है"

सभा में सब चिंतित थे, पर विश्वामित्र के चेहरे पर कुछ और ही भाव था। उन्होंने कहा:

एष मोहो रघुपतेर्नापद्भ्यो न च रागतः ।
विवेकवैराग्यवतो बोध एव महोदयः ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण / सर्ग ११, श्लोक २

अर्थ: राम का यह "मोह" न किसी विपत्ति से आया है, न किसी आसक्ति से। जिसमें विवेक और वैराग्य जाग चुके हों, उसकी यह दशा तो बड़ा फल देने वाला बोध है।

पूरी कथा इसी एक श्लोक पर टिकी है। सभा जिसे बीमारी समझ रही थी, विश्वामित्र उसे शुरुआत कह रहे थे।

फिर राम आए। ग्रंथ उनका वर्णन बड़े मन से करता है: यौवन की शुरुआत, पर स्वभाव में बड़े-बूढ़ों जैसी गंभीरता। मन में कोई उद्वेग नहीं, पर परम आनंद भी अभी नहीं। जैसे कोई घड़ा लगभग भर चुका हो और बस कुछ बूँदें बाकी हों। उन्होंने पिता को, फिर वसिष्ठ और विश्वामित्र को, फिर सब बड़ों को प्रणाम किया।

दशरथ ने बेटे का सिर सूँघा, माथा चूमा और कहा, "वत्स, मेरी गोद में बैठो।" राम गोद में नहीं बैठे। सेवकों ने ज़मीन पर जो वस्त्र बिछाया था, उसी पर बैठ गए। कुछ ही दिन पहले तक यही राम बिना कहे पिता की गोद में जा बैठते थे।

विश्वामित्र ने सीधे पूछा, "राजकुमार, कौन-सी व्यथा है जो घर को खोदते चूहों की तरह तुम्हारे मन को खोखला कर रही है? जो चाहिए, कहो। मिलेगा।"

"इसमें सुख कहाँ है?"

राम ने बोलना शुरू किया, और फिर बहुत देर तक बोले। योग वासिष्ठ में उनकी यह बात बारहवें से इकतीसवें सर्ग तक चलती है।

शुरुआत बिल्कुल सीधी थी: "मैं इसी घर में पैदा हुआ, बड़ा हुआ, विद्या पाई। फिर तीर्थों पर गया। और उसी दौरान मन में एक विचार उठा, जिसने इस संसार पर से मेरा भरोसा छीन लिया।"

किंनामेदं बत सुखं येयं संसारसंततिः ।
जायते मृतये लोको म्रियते जननाय च ॥

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण / सर्ग १२, श्लोक ७

अर्थ: संसार का यह जो सिलसिला है, इसमें सुख नाम की चीज़ है कहाँ? लोग मरने के लिए जन्म लेते हैं और जन्म लेने के लिए मरते हैं।

फिर राम एक-एक चीज़ उठाकर परखते गए। धन, जो मूर्खों को सबसे प्रिय है और बदले में अनर्थ ही देता है। आयु, जो ऊँचे पेड़ के हिलते पत्ते पर लटकी ओस की बूँद जितनी है। शरीर, जो धान के खेत में टर्राते मेंढक के गले की चमड़ी जितना अस्थिर है। और इन सबसे ऊपर मन, जो एक पल भी टिकता नहीं।

पर राम सिर्फ़ शिकायत नहीं करते। अंत में वे एक साफ़ सवाल रखते हैं: क्या कोई ऐसी युक्ति है जिससे संसार में रहते हुए, सारे काम करते हुए भी दुःख न छुए? पहले किसने यह किया, और कैसे?

और फिर वह बात, जिसने सभा को हिला दिया: "अगर ऐसी कोई युक्ति है ही नहीं, या है पर कोई मुझे साफ़-साफ़ नहीं बताता, तो मैं न भोजन करूँगा, न जल पीऊँगा। दीवार पर बने चित्र की तरह मौन बैठा रहूँगा, जब तक यह शरीर बिना तेल के दीये की तरह शांत न हो जाए।"

इतना कहकर राम चुप हो गए।

जब पिंजरे के पक्षी भी चुप हो गए

उस चुप्पी का वर्णन योग वासिष्ठ के सबसे सुंदर हिस्सों में से है। ऋषि, मंत्री, राजा, नगरवासी, सब चित्र की तरह स्थिर बैठे थे। पिंजरों में पक्षियों ने पंख तक नहीं हिलाए। पाले हुए हिरन जहाँ थे, वहीं थम गए। घोड़ों ने घास चबाना छोड़ दिया। झरोखों पर बैठी कौशल्या और दूसरी रानियाँ इतनी स्थिर थीं कि उनके गहनों की खनक तक नहीं हुई।

फिर बिना बादल के आकाश से फूल बरसने लगे। आधी घड़ी तक लगातार। आँगन, छतें, चबूतरे सब फूलों से भर गए और नगर के लोग गर्दन उठाकर आसमान देखते रह गए। ऊपर अदृश्य सिद्ध आपस में कह रहे थे, "सृष्टि के आरंभ से हम लोक-लोकांतर घूम रहे हैं, पर ऐसे वचन आज ही सुने।"

अब सबकी नज़र एक ही बात पर थी। इस सवाल का उत्तर कौन देगा?

उत्तर देने से पहले विश्वामित्र एक और कथा सुनाते हैं, व्यास के पुत्र शुकदेव की, जो जन्म से ज्ञानी थे और फिर भी बेचैन थे। वह इस सीरीज़ की अगली कड़ी में।

मूल संदेश

योग वासिष्ठ की यह शुरुआत एक अनोखी बात सिखाती है। जिस उदासी से पूरा महल घबरा रहा था, गुरु उसी की राह देख रहे थे। विश्वामित्र के शब्दों में, यह मोह नहीं, बोध था।

यहाँ वैराग्य का मतलब संसार से नफ़रत नहीं है। राम को किसी ने धोखा नहीं दिया था, उनके साथ कोई हादसा नहीं हुआ था। उनके पास सब कुछ था, और शायद इसीलिए वे साफ़ देख पाए कि "सब कुछ" भी काफ़ी नहीं है। ज्ञान इसी दरवाज़े से भीतर आता है। जब तक मन को लगता है कि अगली चीज़ मिलते ही सब ठीक हो जाएगा, तब तक वह किसी उपदेश के लिए तैयार नहीं होता।

एक बात और ध्यान देने लायक है। राम भागे नहीं, वन नहीं चले गए। वे सभा में आए और पूछा। उनका सवाल भी यही था कि व्यवहार में रहते हुए दुःख से कैसे छूटें। विश्वामित्र ने भी सभा में यही कहा था कि मोह दूर होने पर राम अपने सारे कर्तव्य फिर से, बिना रुकावट निभाएँगे। वैराग्य यहाँ अंत नहीं, एक मोड़ है।

विषाद से बोध तक — तीर्थयात्रा, प्रश्न, विषाद, फिर मोह या विवेक-वैराग्य के दो रास्ते

जीवन में उपयोग

हममें से बहुतों के जीवन में कभी न कभी ऐसा दौर आता है। काम ठीक चल रहा होता है, घर में सब ठीक होता है, फिर भी भीतर एक खालीपन रहता है। कोई पूछे तो जवाब वही होता है: "कुछ नहीं।"

ऐसे दौर को तुरंत किसी नई चीज़ से भर देने की जल्दी न करें। नई गाड़ी, नई यात्रा, नया शौक, ये कुछ दिन के लिए खालीपन ढक देते हैं, भरते नहीं। राम की कथा कहती है कि इस खालीपन के भीतर अक्सर एक सवाल छिपा होता है। उसे शब्द देने की कोशिश कीजिए। लिखिए, सोचिए, पढ़िए।

और सवाल सही व्यक्ति से पूछिए। सेवक बताता है कि राजनीति समझाने आए पंडितों पर राम हँस देते थे। उन्होंने अपना मन तब खोला जब सामने वसिष्ठ और विश्वामित्र जैसे लोग थे। हर सलाह देने वाला गुरु नहीं होता।

एक ज़रूरी बात भी। राम की उदासी के साथ विवेक था। वे साफ़ सोच रहे थे और ठीक-ठीक सवाल पूछ रहे थे। अगर किसी की उदासी के साथ सोच ही धुंधली होने लगे, या नींद और भूख लंबे समय तक बिगड़ी रहे, तो उसे वैराग्य मानकर टालना ठीक नहीं। ऐसे में डॉक्टर या काउंसलर से मिलना भी उतना ही ज़रूरी है।

जब मन अचानक उचट जाए — एक व्यावहारिक क्रम

लेखक का मत

मुख्य शब्द

शब्द अर्थ Meaning
विषाद गहरी उदासी, मन का बोझिल हो जाना Deep despondency or dejection
वैराग्य नश्वर चीज़ों से मन का स्वाभाविक रूप से हट जाना Dispassion; natural detachment from the transient
विवेक नित्य और अनित्य में भेद करने की समझ Discernment between the lasting and the passing
बोध जागृति, सत्य की ओर पहली समझ Awakening; the first glimpse of truth
मोह अज्ञान से उत्पन्न भ्रम और आसक्ति Delusion and attachment born of ignorance
युक्ति वह उपाय या विधि जिससे मन शांत हो A method or means that brings the mind to rest
सिद्ध पूर्णता को प्राप्त दिव्य जन, जो आकाश में विचरते हैं Perfected celestial beings

Sources

  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण / सर्ग ३–५ (तीर्थयात्रा, वापसी और राम की उदासी)
  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण / सर्ग ६–११ (विश्वामित्र का आगमन, दशरथ का विषाद, राम का सभा में आना)
  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण / सर्ग १२–३१ (श्रीराम के वैराग्य-वचन)
  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण / सर्ग ३२–३३ (सभा का आश्चर्य और सिद्धों की पुष्पवृष्टि)