Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, Verses 19–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 1, verses 19–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 1 · श्लोक 19-27
संस्कृत श्लोक
पित्रेत्युक्ते शुकः प्रायात्सुमेरोर्वसुधातले ।
विदेहनगरीं प्राप जनकेनाभिपालिताम् ॥ १९ ॥
आवेदितोऽसौ याष्टीकैर्जनकाय महात्मने ।
द्वारि व्याससुतो राजञ्शुकोऽत्र स्थितवानिति ॥ २० ॥
जिज्ञासार्थं शुकस्यासावास्तामेवेत्यवज्ञया ।
उक्त्वा बभूव जनकस्तूष्णीं सप्त दिनान्यथ ॥ २१ ॥
ततः प्रवेशयामास जनकः शुकमङ्गणम् ।
तत्राहानि स सप्तैव तथैवावसदुन्मनाः ॥ २२ ॥
अथ प्रवेशयामास जनकोऽन्तःपुरं शुकम् ।
राजा न दृश्यते तावदिति सप्त दिनानि च ॥ २३ ॥
तत्रोन्मदाभिः कान्ताभिर्भोजनैर्भोगसंचयैः ।
जनको लालयामास शुकं शशिसमाननम् ॥ २४ ॥
ते भोगास्तानि दुःखानि व्यासपुत्रस्य तन्मनः ।
नाजह्नुर्मन्दपवना बद्धपीठमिवाचलम् ॥ २५ ॥
केवलं सुसमः स्वस्थो मौनी मुदितमानसः ।
अतिष्ठत्स शुकस्तत्र संपूर्ण इव चन्द्रमाः ॥ २६ ॥
परिज्ञातस्वभावं तं शुकं स जनको नृपः ।
आनीतं मुदितात्मानमवलोक्य ननाम ह ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
पिताजी के यों कहने पर श्रीशुकदेवजी सुमेरू पर्वत से पृथिवी में आये और महाराज जनक से
संरक्षित विदेहनगरीमें पहुँचे। द्वारपालों ने महात्मा जनकको सूचना दी कि राजन्, दरवाजे पर वेदव्यासजी
के सुपुत्र श्रीशुकदेवजी स्थित हैँ । जनकजी शुकदेवजी का चरित सुन चुके थे, अतएव सहसा उपदेश
देने में श्रीव्यासजी के वाक्यों का जैसे अनादर किया वैसे ही मेरे उपदेश का अनादर होने से उनकी
अकृतार्थता न हो, यह विचारकर उनके वैराग्य आदि साधनों की और विश्वास की स्थिरता की परीक्षा
के लिए उपेक्षा के साथ, अच्छा, आये हैं, तो क्या हुआ ? रहें एसा कहकर सात दिन तक चुपचाप रह
गये। सात दिन के अनन्तर उन्होने शुकदेवजी को घर के आँगन के अन्दर प्रवेश कराने की अनुमति दी,
वहाँ पर भी वे पूरे सात दिन तक वैसे ही उन्मना अर्थात् तत्त्वजिज्ञासा की उत्कण्ठा से अनादर की ओर
कुछ ध्यान न देकर बैठे रहे | तदुपरान्त जनक ने शुक को अन्तःपुर में प्रवेश कराने की आज्ञा दी । वहाँ
२3 अन्य की वंचना के लिए की गई कृत्रिम चेष्टा आडम्बर है ।
पर भी जब तक तुम्हारी भोजन आदि द्वारा पूजा नहीं हो जाती तब तक राजा नहीं दिखाई देंगे, इस
बहाने से राजाने चन्द्रमा के सदृश सुन्दर मुखवाले शुकदेवजी का अन्तःपुर में यौवनमदमत्त स्त्रियों द्वारा
विविध भोगपूर्णं भोजनों से सात दिन तक लालन पालन किया जैसे मन्द वायु बद्धमूल वृक्ष को नहीं
उखाड़ सकता, वैसे ही वे भोग, वे दुःख व्यासदेवजी के पुत्र के मन को विकृत न कर सके । वहाँ पर पूर्ण
चन्द्र के सदृश सुन्दर श्रीशुकदेवजी भोग ओर अनादर में समान (हर्ष-विषादरहित) अतएव स्वस्थ,
वागादि इन्द्रियों को अपने वश में किये हुए एवं प्रसन्नमन रहे । इस प्रकार परीक्षा द्वारा श्रीशुकदेवजी के
तत्त्वज्ञान होने तक स्थिर रहनेवाले विचार, वैराग्य आदि की दृढतारूपी स्वभाव को जानकर राजा
जनक ने आदर से समीप में लाये गये प्रसन्नचित्त श्री शुकदेवजीको देखकर प्रणाम किया