Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 85
चौरासीवाँ सर्ग समाप्त पचासीवाँ सर्ग नृत्य कर रही काली का शिवजी का दर्शन ओर बड़े प्रेम से स्पर्श कर उनके अंग मेँ विलीन हो एकरूप हो जाना, यह वर्णन।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, वर्णित रीति से भगवती कालरात्रि भयंकर नृत्य करती है, उसके नृत्…
- Verse 2श्रीरामजी, चितिशक्तिका असली तत्त्व न जानने पर वह क्रियारूप बन जाती है ओर वह स्वभाव से वहा…
- Verse 3बाण, शक्ति, गदा, भाला, मूसल आदि, शिला आदि, भाव, अभाव आदि पदार्थसमूह तथा कला, काल के क्रम…
- Verse 4जैसे अलात का (लाठी का) स्यन्दन वक्र के आकार में दिखाई देता हैं, वैस़े ही उक्त बिति का स्य…
- Verse 5अब शिवजी की इच्छारूप वह कालानि शिवजी से अभिन्न है. यह कहते हैं / जैसा पवन का स्पन्दन है,…
- Verse 6आकार से रहित शिवेच्छा साकार जगत् के रूप में कैसे परिणत होगी 2 इस पर कहते हैं / भद्र, जैस…
- Verses 7–8भद्र, तदनन्तर जैसे बह रही समुद्रजल की रेखा अपने विनाश के लिए बड़वाग्निका स्पर्श करती है,…
- Verse 9हट जाने के अनन्तर परमकारण एकमात्र शिवजी के स्पर्श से वह कालरात्रि धीरे-धीरे अपने अव्यक्तभ…
- Verse 10भौतिक अनन्त आकारों को त्यायकर वह केवल श्रुतमात्ररूय हुई. यह कहते हैं / पहले उसने अपने विश…
- Verse 11तदनन्तर अव्याकृत आकाश के सदृश आकारवाली हुई, फिर वह शिवजी के आकार में उस प्रकार सब आडम्बर…
- Verse 12अनन्तर शिवा से रहित एकमात्र शिवजी ही बच गये । ये पूर्ववर्णित चिदाकाशरूप गगन में सबका उपसं…
- Verse 13श्रीरामभद्र ने कहा : भगवन्, शिवजी से स्पर्श की हुई भगवती शिवा कालरात्रि क्यों शान्त हो ग…
- Verse 14श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, वह प्रकृति है, वह परमेश्वर की इच्छारूप शक्ति है । शास्त्…
- Verse 15प्रसिद्ध जो शिवजी हैं, वे प्रकृति से पर पुरुष कहलाते है, पवनाकृति शिवरूप धरनेवाले पुरुष भ…
- Verses 16–17श्रीरामजी, वह शिवजी की इच्छारूप केवल स्वरूपधारिणी परमेश्वर की चितिशक्ति भ्रमरूपी प्रकृति…
- Verse 18यह प्रकृति एकमात्र चितिशक्ति की आधारभूत है, इसलिए चितिशक्ति ही समझनी चाहिए। काकतालीय योग…
- Verse 19पुरुष को छूकर समुद्र मे नदी के सदृश उसके अन्दर एकरूप बनकर प्रकृति अपना कार्यरूप परिणाम छो…
- Verse 20इसमें युक्ति बतलाते है/ नदियों का स्वरूप तो केवल जलमात्र ही है, समुद्र का संग होनेपर भी उ…
- Verse 21राघव, लोहनिर्मित छुरी आदि की धारा उत्पत्तिकारण लोहशिला को प्राप्त कर उसीमें जैसे शान्त हो…
- Verse 22वन आदि की छाया में प्रवेश किये हुए पुरुष की निजी छाया, जैसे उसीके रूपकी हो जाती है, वैसे…
- Verse 23तब तो वन में से निकल जाने के बाद जैसे फिर अपनी छाया अलग हो जाती है, वेसे ही अल्मप्राप्त प…
- Verse 24तभी इस्र सार मे फिर आना होता हैं, जब ससार की इच्छा रहती हैं, परन्तु तत्वज्ञान हो जाने पर…
- Verse 25जब तक परम आत्मा के स्वरूप को प्रत्यक्षरूप से नहीं देखती तभी तक असद्रूप द्वैतप्रपंच में चि…
- Verses 26–27चूँकि चिति में निर्वाणात्मक प्रशान्त स्वरूप ही परमपद है, इसलिए प्रकृति (अज्ञानयुक्त चिति)…
- Verse 28यहाँ तक जितनी बातें कही यह. उन सबका संग्रहकर उपहार करते हैं / हे रामभद्र, जब तक उस परब्रह…