Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
चित्स्पन्दोऽन्तर्जगद्धत्ते कल्पनेव पुरं हृदि ।
सैव वा जगदित्येव कल्पनैव यथा पुरम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अलात का (लाठी का) स्यन्दन वक्र के आकार में दिखाई देता हैं, वैस़े ही उक्त बिति का
स्यन्दन जगत् के आकार में दिखाई देता हैं, यह कहते हैं /
भद्र, जैसे हृदय मेँ कल्पना (मनोराज्य-कल्पना) ही नगराकार को धारण करती है, वैसे ही
चिति का स्पन्दन ही अपने भीतर जगत् को धारण करता है । अथवा जैसे मनोराज्य कल्पना ही
नगर है, वैसे ही स्पन्दित चिति ही जगत् है, यह आप जानिये