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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

चेतित्वा चिन्निजं भावं पुरुषाख्यं सनातनम् । भूयो भ्रमति संसारे नेह तत्तां प्रयाति हि ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

तब तो वन में से निकल जाने के बाद जैसे फिर अपनी छाया अलग हो जाती है, वेसे ही अल्मप्राप्त पुरुष को भी फिर ससार प्राप्त हो सकता हैं, इस पर कहते है / भद्र, अपना सनातन पुरुषरूप जो भाव है, उसको प्रकाशित कर देने के अनन्तर फिर वह न इस संसार में भ्रमण करता है और न प्रकृतिभाव को ही प्राप्त करता है, क्योकि पुनरागमन में निमित्त अज्ञान का बाध हो जाता है