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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verses 16–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

भ्रमति प्रकृतिस्तावत्संसारे भ्रमरूपिणी । स्पन्दमात्रात्मिका सेच्छा चिच्छक्तिः पारमेश्वरी ॥ १६ ॥ यावन्न पश्यति शिवं नित्यतृप्तमनामयम् । अजरं परमाद्यन्तवर्जितं वर्जितद्वयम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, वह शिवजी की इच्छारूप केवल स्वरूपधारिणी परमेश्वर की चितिशक्ति भ्रमरूपी प्रकृति इस संसार में तब तक भ्रमण कर सकती है, जब तक नित्य तृप्त, अजर, सर्वोत्कृष्ट, आदि-अन्तशून्य, द्वैतरहित, विकारशून्य परमात्मा को नहीं देख लेती । इससे निष्कर्ष यह निकला कि शिवेच्छारूप चितिशक्ति मेँ तब तक स्पन्दन रहता है, जब तक कि इष्टप्राप्ति नहीं हो जाती ओर इष्ट की प्राप्ति (परमात्मा की प्राप्ति) हो जानेपर तो उसकी शान्ति हो जाती है