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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

साधुर्वसति चोरौघे तावद्यावदसौ नतम् । परिजानाति विज्ञाय न तत्र रमते पुनः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

तभी इस्र सार मे फिर आना होता हैं, जब ससार की इच्छा रहती हैं, परन्तु तत्वज्ञान हो जाने पर तो ससार की इच्छा ही नहीं रह जाती, यह कहते हैं । साधु पुरुष तब तक चोरों के समुदाय में रहता है, जब तक कि वह उसे जानता नहीं यानी भ्रान्ति से चोर को अपना हितैषी समझकर तब तक उसके बीच में रहता है, जब तक कि यह चोर है और मेरा हितैषी नहीं है, यह नहीं जान पाता । परन्तु जब जान लेता है कि यह चोर ओर अहितैषी है फिर उसके बीच में रमण या वास नहीं करता