Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
अमूर्तो मूर्तमाकाशे शब्दाडम्बरमानिलः ।
यथा स्पन्दस्तनोत्येवं शिवेच्छा कुरुते जगत् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
आकार से रहित शिवेच्छा साकार जगत् के रूप में कैसे परिणत होगी 2 इस पर कहते हैं /
भद्र, जैसे आकाररहित वायु का स्पन्दन आकाश में साकार शब्दाडम्बर पैदा करता है, वैसे ही
शिवजी की निराकार इच्छा साकार जगत् पैदा करती है