Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अनन्ताकारतां त्यक्त्वा संपन्ना गिरिमात्रिका ।
ततो नगरमात्रासौ ततश्च द्रुमसुन्दरी ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
भौतिक अनन्त आकारों को त्यायकर वह केवल श्रुतमात्ररूय हुई. यह कहते हैं /
पहले उसने अपने विशाल आकार का परित्याग किया, पंचीकरण त्यागकर पर्वताकृति बन गई,
इसके बाद नगराकृतिमात्रस्वरूप हुई, फिर वह विचित्र वासनारूप पल्लव के कारण वृक्ष के सदृश
सुन्दरी बन गई