Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
द्वैते तावदसद्रूपे रमते भ्रमते चितिः ।
परं पश्यति नो यावत्तं दृष्ट्वा तन्मयी भवेत् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जब तक परम आत्मा के स्वरूप को प्रत्यक्षरूप
से नहीं देखती तभी तक असद्रूप द्वैतप्रपंच में चिति (अज्ञ चिति यानी जीव) रमण और भ्रमण करती
है । जब उसका प्रत्यक्ष कर लेती है, तब तो तन्मय बन जाती है