Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 78
सतहत्तरवाँ सर्ग समाप्त अठठहत्तरवाँ सर्ग नदी के रूप में गिरनेवाली घनघोर वृष्टिधाराओं से चारों ओर से आकाश को पूर्ण कर रहा जो एक महासमुद्र बढ़ा, उसका विस्तारपूर्वक वर्णन।
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- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, जब धरातल वायु, वर्षा, हिम ओर अनेक तरह के उत्पातों के…
- Verses 2–3वह समुद्र आकाशगंगा के प्रवाहों में पतित मेघधाराओं के गिरने से खूब बढ़ा या उस तरह की मेघधा…
- Verse 4सर्ग्िमाप्तिपर्यन्त उसी एकार्णव का वर्णन करते हैं / इस बढ़े हुए समुद्र ने अपने आवर्तस्वभा…
- Verse 5उसमें मेरु, मन्दर, कैलास, विन्ध्य और सह्य पर्वत तो जलचर-से हो गये और उसमें जो पृथ्वी गल ग…
- Verse 6उस समुद्र में अर्धदग्ध वृक्षों से युक्त वनसमूह तो शैवाल-सा लग रहा था ओर त्रिलोकी के भस्म…
- Verse 7इन नालों मे जो बड़ी कर्णिकाएँ थीं उनमें बीजभूत किरणों के द्वारा उत्ताल हुए बारह आदित्य ही…
- Verse 8उसमें उत्पन्न रनों के बड़े-बड़े पर्वतां के प्रान्तभाग में उन्मत्त मेघ शब्द कर रहे थे और घ…
- Verse 9उसमें उग्र सुर, असुर ओर मनुष्यों के समूह काठ के सदृश बह रहे थे। वह समुद्र धीरे-धीरे क्रमश…
- Verse 10भद्र, उस समय समुद्र मे जो महागर्जना कर रहे मेघों से बुलबुले उठ रहे थे, उनको देखकर यह सन्द…
- Verse 11उस समुद्र में इधर-उधर नाच रहे बुलबुलों पर कल्पान्त के महामेघ विश्राम कर रहे थे और स्वयं न…
- Verse 12भारी प्रवाह से युक्त जल के ओघ से जो भयंकर घोष हो रहा था, उससे आकाश को भी वह सावधान कर रहा…
- Verse 13प्रचण्ड पवन के द्वारा उत्पन्न जो अपूर्व जलौघ थे उनसे उसने अपने अन्दर सातां कुलपर्वत की मा…
- Verse 14ब्रह्माण्डखण्डों के परस्पर संघडनों का जो पुनः-पुनः आवर्तन हो रहा था, उससे उसकी उद्धता क्ष…
- Verse 15तरगों पर जैसे तृण झूलते हैं, वैसे ही उसकी तरगों पर महान् पर्वत झूल रहे थे, इन झूला झूल र…
- Verse 16भद्र, उस शून्य ब्रह्माण्डरूप घोंसले के भीतर, जो कि एकमात्र विपुल जलसमूह से ही बना था, विद…
- Verse 17नील-पर्वत रुपी द्रोणकाकों का ही दो विशेषणों से वर्णन करते हैं / मृतक एवं जीवित प्राणियों…
- Verse 18भद्र, जो मरने से बच गये थे और अपने-अपने नगरों से च्युत हो गये थे, ऐसे जल के बल पर विश्राम…
- Verse 19उस समुद्र में जो बुलबुले उठ रहे थे, वे उनके भीतर स्थित प्राणियों की दृष्टि से चाँदी के कड…
- Verse 20शरत्काल के आकाश के सदृश विशाल उठ रहे बुद्बुदोंरूपी नेत्रो से वह नदियों के समान धारावाले च…
- Verse 21हे श्रीरामजी, यह प्रलयकाल का समुद्र पंखसहित पर्वतो के तुल्य आविर्भूत हुए अनेक तरंगमण्डलों…
- Verse 22तीनों लोक के ग्रास से संतृप्त हुआ वह प्रलयकालीन महासागर घर्घर शब्दों से एक तरह का गीत गा…
- Verse 23हे श्रीरामचन्द्रजी, धरा से शून्य वह सागर ऊपर नदी के सदृश धाराओंवाले मेघो से, मध्य में दग्…
- Verse 24निरन्तर गिर रही धाराओं से सुशोभित गंगाजी की बाढ़ से वह परिपूर्ण था। उसमें पर्वतशिखर के डू…
- Verse 25उसमें बढ़ते हुए छिन्न-भिन्न स्वर्गं के अनेक खण्डों में देवतारूपी अनेक हंस विद्यमान थे । ए…
- Verses 26–27एकमात्र समुद्रो के जलो की उस बाढ़ से घर्घरशब्दयुक्त, अतिवेगशाली सम्पूर्ण त्रैलोक्य के खण्…
- Verse 28हे श्रीरामजी, ओर अधिक हम क्या कहें, सिर्फ यही कह देना पर्याप्त है कि उस समय आकाश नहीं था,…