Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
विपुलावर्तवृत्त्यात्तविवृत्ताद्रिजरत्तृणः ।
स्फुरत्तुङ्गतरङ्गाग्रनिगीर्णादित्यमण्डलः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्ग्िमाप्तिपर्यन्त उसी एकार्णव का वर्णन करते हैं /
इस बढ़े हुए समुद्र ने अपने आवर्तस्वभाव के कारण बड़े-बड़े पर्वतों को जीर्ण तृण के समान
पकड़ कर चक्कर में डाल दिया तथा चंचल उत्तुंग तरंगों के अग्रभागों से वह आदित्यमण्डल को भी
निगल गया