Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, Verses 2–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 2,3
संस्कृत श्लोक
गङ्गाप्रवाहपतितधारापातविवर्धितः ।
सरित्सहस्रैः सहसा मेरुमन्दरभासुरैः ॥ २ ॥
आदित्यपथसंप्राप्तकन्दरो जडमन्थरः ।
एकार्णवः समुच्छून आसीन्मूर्ख इवेश्वरः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
वह समुद्र आकाशगंगा के प्रवाहों में पतित मेघधाराओं के गिरने से
खूब बढ़ा या उस तरह की मेघधाराओं से जनित हजारों नदी धाराओं से खूब बढा । अकस्मात्
उत्पन्न हुई मेरु एवं मन्दर पर्वत के सदृश भासुर तरंगों से बहाये जा रहे पर्वत कन्दराओं को
उसने आदित्य के मार्ग में पहुँचा दिया । थोड़े में यही कहना है कि मूर्ख राजा के सदृश जल
से मन्थर वह समुद्र बहुत ही उन्नत हो गया