Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
ब्रह्माण्डखण्डसंघट्टपरावृत्तिभिरुद्धतः ।
कुर्वन्योजनलक्षाणि विततान्युन्नतानि च ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माण्डखण्डों के
परस्पर संघडनों का जो पुनः-पुनः आवर्तन हो रहा था, उससे उसकी उद्धता क्षण-क्षण में बढती
ही जा रही थी, ओर ऊपर-नीचे लाखों योजनं तक विस्तारवाले पदार्थों को अपने उदर में वह
निगलता जा रहा था