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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 7

छठा सर्ग समाप्त सातवाँ सर्ग ब्रह्म की ही सत्ता है, जगत्रूपी दुःख की सत्ता है ही नहीं, यह सारा जगत्‌ अज्ञान के कारण प्रतीत हुआ है तथा अहंकाररूपी बीज से यह जगदूपी वृक्ष उत्पन्न हुआ है- इन सबका वर्णन ।

20 verse-groups

  1. Verse 1भुशुण्ड ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, तदनन्तर विद्याधर के उन पवित्र वचन को सुनकर प्रश्न के अनुसा…
  2. Verse 2हे विद्याधराधीश, हर्ष का विषय है कि आज तुम कल्याण के लिए भाग्यवशात्‌ जाग गये हो चिरकाल के…
  3. Verse 3जिस तरह अग्नि से व्याप्त सुवर्णं द्रव-सन्तति अत्यन्त सुन्दरता से युक्त होकर शोभने लगती है…
  4. Verse 4अतः मुझे विश्वास है कि यह तुम्हारी बुद्धि मेरी उपदेशवाणी के अर्थ का बिना किसी प्रयत्न के…
  5. Verse 5मैं जो कुछ यह कहूँगा, उन सबका तुम हाँ” कह करके ग्रहणकर लेना, तुम ग्रहण करने में ही समर्थ…
  6. Verse 6सम्पूर्ण दृश्यप्रपंच का विवेक हो जाने पर साक्षिरूप शुद्ध ब्रह्म ही एकमात्र अवशिष्ट रहता ह…
  7. Verse 7जैसे तुच्छ बने रहते हैं वैसे ही ये इन्द्रियाँ भी विषय-वासनारूपी कतवारों से परिपूर्ण होने…
  8. Verse 8ऊपर में जो द्वश्यमात्र को अबोधस्वरूप बतला आये हैं; अब उक्ती का उपपादन करते हैं । क्या सुष…
  9. Verse 9यह सारा जगत्‌ ब्रह्य का विवर्त ह इस तरह इस जयत्‌ में बल्यविवर्तता का अवलोकन ही त्याग है /…
  10. Verse 10उक्त अभिप्राय को विशवरुप से बतलाते हए उसके प्रतिभास का भी खण्डन करते हैं । मृगजल के समान…
  11. Verse 11पर्वत, सागर, पृथ्वी, नदी आदि के सहित यह जगद्रूी पुराना वृक्ष उत्पन्न होता है
  12. Verse 12सूक्ष्म अहंकाररूपी बीज से वह जगद्रूपी वृक्ष उत्पन्न होता है और इन्द्रियों के विषयों में आ…
  13. Verse 13अश्विनी आदि सत्ताईस तारे इसकी प्रधान कलियाँ हैं, अन्य तारों के समूह इसके अन्य कलियां के स…
  14. Verse 14महान्‌ लोगों के स्वर्ग आदि लोकवर्ग इसके महान्‌ शाखा समूहों के गरभप्रदेश है । मेरु, मन्दर,…
  15. Verse 15सातों समुद्र इसके आलबालपरिखा (चारों ओर के थाले) हैँ, पाताल इसका मूल कोटर है, सत्ययुग आदि…
  16. Verse 16अज्ञान ही इसकी उत्पत्ति की भूमि है, अनेक जीव इसके करोड़ों पक्षी हैं, भ्रान्तिज्ञान ही इस…
  17. Verse 17इन्द्रियों से अर्थो की उपलब्धि यानी विषयों का साक्षात्कार एवं मन से होनेवाले संकल्प और वि…
  18. Verse 18सब ऋतुएँ इसकी विचित्र शाखाएँ है, दसों दिशाएँ उपशाखार है, आत्मसंवित्‌ इसके जीवन के लिए रस…
  19. Verse 19प्रतिदिन उदय और अस्त में तत्पर चन्द्र ओर सूर्य की चंचल किरणे ही इसकी रम्यकुसुम मंजरियाँ ह…
  20. Verse 20इस तरह का यह संसाररूपी वृक्ष मूल से (जड़ से) पाताल को, मध्य से सभी दिशाओं को ओर अपने मस्त…