Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
किमज्ञत्वाज्जगज्जातं जगतोऽथ किमज्ञता ।
विचार्यापीति नो विद्म एकत्वादलमेतयोः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
ऊपर में जो द्वश्यमात्र को अबोधस्वरूप बतला आये हैं; अब उक्ती का उपपादन करते हैं ।
क्या सुषुप्ति में अहंकारादिभाव से घनीभूत प्रसिद्ध जो अज्ञान है, उसीसे जाग्रत् और स्वप्न
स्वरूप यह संसार सारा उत्पन्न हुआ है अथवा पिघले हुए कठिन लोह के समान विलीन हुए
जाग्रदादिरूप इस संसार से सुषुप्तिकाल का अज्ञान उत्पन्न हुआ है, इसका बहुत विचार करने पर
भी कोई विनिगमक हेतु न होने से कार्यकारणभाव की व्यवस्था हम नहीं समझ रहे हैँ । अतः
काठिन्य ओर द्रवावस्था में घत के एकत्व की नाई इन दोनों मे एकत्व होने से सब कुछ एकमात्र
अज्ञानस्वरूप है, यही हमने आखिर में निश्चय किया है