Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
नाहंत्वमस्ति न जगदिति निश्चयिनस्तव ।
सर्वमस्ति शिवं तच्च न दुःखाय सुखाय ते ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तुच्छ बने रहते हैं वैसे ही ये इन्द्रियाँ भी विषय-वासनारूपी कतवारों से परिपूर्ण होने
के कारण अतितुच्छ बनी हैं ।
यह समझना अनुचित होगा कि द्रष्टा ओर द्ृश्यरृप सम्पूर्ण प्रपंच का त्याग हो जाने पर
शून्यतापत्ति आ जायेगी, क्योंकि चुख-द्ुःख के वेषस्य के प्रयोजक कल्पित दोग की निवृत्ति
से वास्तविक परम कल्याणस्वरूप ब्रह्मभाव से परिपूर्ण ग्रभी पदार्थ अवस्थित रहते ही है इस
आशय से कहते हैं /
नमैं हूँ, न तुम हो और न तो यह सारा संसार ही है, यदि ऐसा तुम निश्चय कर लेते हो, तो
बस यह समझ लो कि यह समस्त दृश्यप्रपंच शिवस्वरूप है और न यह तुम्हारे सुख के लिए है और
न दुःख के लिए है