Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
पावनीयं तव मती राजते घनरूपिणी ।
विवेकेनानलेनेव कनकद्रवसंततिः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस तरह अग्नि से
व्याप्त सुवर्णं द्रव-सन्तति अत्यन्त सुन्दरता से युक्त होकर शोभने लगती है, उसी तरह विवेक
से निबिड़रूप को व्याप्त हुई तुम्हारी यह पवित्र बुद्धि किसी अनिर्वचनीय सौन्दर्य से शोभित
हो रही है