Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
मृगतृष्णाम्बुवद्विश्वं नास्ति त्वमथवास्ति च ।
प्रतिभासोऽपि नास्त्यत्र तदभावादतः शिवम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अभिप्राय को विशवरुप से बतलाते हए उसके प्रतिभास का भी खण्डन करते हैं ।
मृगजल के समान यह सारा विश्व कुछ भी नहीं है अथवा कुछ है ही । प्रतिभास्य के अभाव से
यहाँ प्रतिभास भी नहीं है (५) अतः एकमात्र शिवस्वरूप ही यह सारा विश्व स्थित है