Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
पातालमाशागणमन्तरिक्षमापूर्य तिष्ठत्यसदेव सद्वत् ।
तस्यानहन्ताग्निहतेऽहमर्थबीजे पुनर्नास्ति सतोऽपि रोहः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह का यह संसाररूपी वृक्ष मूल से (जड़ से)
पाताल को, मध्य से सभी दिशाओं को ओर अपने मस्तक से अन्तरिक्ष को परिपूर्ण करके वस्तुतः
असद्रूप होने पर भी सद्रूप-सा स्थित है । उस अनहंभावरूपी अग्नि से उसका अहंकाररूपी बीज
भुन दिये जाने पर जब तक इस शरीर का पतन नहीं हो जाता तब तक जीवन्मुक्तिभोग के लिए
प्रतिभास के विद्यमान रहते हुए भी इसके संसाररूपी वृक्ष का जन्मादि के द्वारा पुनः प्ररोह नहीं हो
सकता यानी फिर यह अंकुरित नहीं हो सकता