Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 7, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
रूपालोकमनस्कारा विविधामोदवृत्तयः ।
वनं विपुलमाकाशं शुक्तिजालं मुखत्वचः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इन्द्रियों से अर्थो की उपलब्धि यानी विषयों का साक्षात्कार एवं मन से होनेवाले संकल्प
और विकल्प आदि इस वृक्ष के अनेक तरह के सुगन्धप्रसार हैँ । अव्याकृत आकाश इसका विपुल
वन है तथा नेत्र, ओष्ट आदिका विकार ही इसके शुक्तिजाल-जैसे फूलों का खिलना है