Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 68
सड़सठवाँ सर्ग समाप्त अडसठवाँ ~ ु सर्ग आधिभौतिक भ्रान्ति का निरास करके समाधि से जो आतिवाहिक भाव की स्थिति होती है, वह सत्य है ।
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- Verse 1विद्याधरी ने कहा : हे भगवन्, चूँकि दृढाभ्यास नामक समाधिरूप यत्न के बिना देहादि मेँ आधिभौ…
- Verse 2महाराज वसिष्ठजी ने कहा : इस तरह उस पर्वत के ऊपर उस विद्याधरी के युक्तियुक्त वचन कहने पर म…
- Verse 3ओर उस समाधि में सम्पूर्ण बाह्य पदार्थों की कल्पना का त्याग हो जाने पर चिन्मात्र एकरूप होक…
- Verse 4इसके अनन्तर चिदाकाशरूपता को प्राप्त होकर मैं दिव्य दृष्टि को ऐसे प्राप्त हुआ, जैसे शरत्का…
- Verse 5इसके अनन्तर सत्य परमात्मा के दृढ़ अभ्यास से देह में मेरी आधिभौतिकता भ्रान्ति निश्चितरूप स…
- Verse 6ओर उस समय उदय एवं अस्त से रहित, नित्य अनावृत स्वप्रकाशरूपा, अतिनिर्मल, महाचिदाकाशरूपता एक…
- Verse 7इसके बाद जब मैं साक्षीरूप अपने ही निर्मल तेज से देखने लगा, तो मुझे वस्तुतः न तो वह आकाश द…
- Verse 8उस तरह का वह परमार्थघन स्वच्छ परमतत्त्व ही भासित हो रहा है । तथा वह परमतत्त्व ही मेरा आत्…
- Verse 9जैसे स्वप्न में अपने घर के भीतर एक पत्थर के रूप से देखी गई विशाल शिला केवल चिदाकाशरूप ही…
- Verse 10यदि यह व्यवहार स्वप्नरूप ही हैं, तो फिर वहाँ अपनी या दूसरे किसी की जाग्रतअवस्थारूपता का प…
- Verse 11स्वप्न में स्थित जिन पुरुषों का सिर कट चुका है वे स्वप्न-संसार में स्थित होकर ज्ञान के बि…
- Verse 12इसलिए यूलअज्ञानरुपी निद्रा के उच्छेद से स्वरूप का प्रतिबोध ही इस जीवका युख्य प्रतिबोध है…
- Verse 13यही कारण है कि भेने स्वरूपबोध के पहले जिसकी आकृति शिलामय देखी थी, उस स्वच्छ चिद्घन ब्रह्म…
- Verse 14भूतो की आदि सृष्टि में स्थित जो शुद्ध ओर जो पारमार्थिक ब्रह्मरूप है वही तत्त्वज्ञानियों क…
- Verse 15जो ब्रह्म का आत्मीय पुरातनरूप है वही भूतो का अपना पारमार्थिकरूप है वह मनोराज्य या संकल्प…
- Verse 16ठीक हैं, ऐसा ही सही, लेकिन वह आतिवाहिक देह कोन है जिसके सद्भाव में सम्पूर्ण जगत् का दर्श…
- Verse 17तब आपने यह पहले कैसे कहा है कि मन जीव का आतिवाहिक शरीर है, इस पर कहते हैं / सृष्टि के आका…
- Verse 18इस प्रकार स्वयं वही चिति का रूप अज्ञान के कारण व्यर्थ ही अन्यरूपता को प्राप्त हो गया है ।…
- Verse 19हे श्रीरामचन्द्रजी, इस समय जो यह मनप्रतयक्ष है वह आधिभौतिक देह आदि की कल्पना द्वारा अत्यन…
- Verse 20तब सभी लोगें को उम्र प्रत्यक्ष मे परोक्षता का अनुभव तथा अन्यत्र प्रत्यक्षता का अनुभव कैसे…
- Verse 21हे श्रीरामचन्द्रजी, चित् में सर्वप्रथम स्फुरित होनेसे सूक्ष्म ही प्रत्यक्ष होता है उसी क…
- Verse 22जैसे अनुभव करने पर सुवर्णं में कटकता बिलकुल नहीं है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर में आधिभौतिकता…
- Verse 23हे श्रीरामजी, विचार न रहने के कारण यह जीव भ्रम में अभ्रमरूपता ओर अभ्रम में भ्रमरूपता प्रा…
- Verse 24बहुत विचार कर देखने से यह आधिभौतिक स्थूल शरीर उपलब्ध नहीं होता ओर आतिवाहिक -सूक्ष्म शरीर…
- Verse 25सूक्ष्म शरीरउपहित चिति मेँ आधिभौतिकता की प्रथा यानी स्थूल शरीररुपता की बुद्धि मिथ्या ही ए…
- Verse 26सूक्ष्मशरीरउपहित चिति क्रम में उत्पन्न हुई आधिभौतिकी बुद्धि यानी स्थूलबुद्धि स्थूलशरीर की…
- Verse 27जैसे शुक्ति में रजत, जैसे मृगतृष्णा मे जल और जैसे चन्द्रमा में दो चन्द्र की बुद्धि मिथ्या…
- Verse 28अहो, इस जीव के अविचार से उत्पन्न हुए मोह के माहात्म्य को तो जरा देखिये, उसने जो असत् है…
- Verse 29वास्तव में तो योगियों की प्रत्यक्ष -भूत चिति स्फूर्ति ही सत्य है ओर मानस स्पन्द तो कुछ (५…
- Verse 30जो सर्वसताधारण को प्रत्यक्ष है, एकमात्र उम्रीमें सब कुछ छोड़कर योग से स्थिरता सम्पादन करन…
- Verse 31ङी तरह योगियों के अनुभवश्तिद्ध सर्वसाधारण जो छख है उसी में परमपुरुषार्थक्पता जाननी चाहिए,…
- Verses 32–33पूर्वोक््त को ही दृढ़ करने की इच्छा करते हुए फिर कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह स…
- Verse 34तीनों लोक के अनुभव देनेवाले सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रत्यक्ष को छोड़कर जो ऐहिक स्थूल प्रत्यक्ष…
- Verse 35जहाँ पिथ्या सकल्पमय का जन्म ही दुर्लभ है वहाँ उसकी सत्ता तो अत्यन्त दुलभ हैं ही, फिर उत अ…
- Verse 36नेत्र आदि प्रमाण से प्रिद्ध हुए प्रव (जगत्) का आप कैसे अलाप करते हैं; इस पर कहते हैं / ज…
- Verse 37जब स़ाक्षात् अर्थो की साधक वश्च आदि इन्द्रियों की ऐसी दशा है, तब भला तन्मूलक अनुमान आदि…
- Verse 38इसलिए जो कुछ हमने कहा है उसका स्फूरित यही है कि प्रमाणसिद्ध दृश्य प्रपंच कहीं भी नहीं है…
- Verse 39हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे स्वप्न में पर्वत देखनेवाले का प्रसिद्ध स्वप्न उस समय भी शून्यरूप…
- Verse 40हे श्रीरामचन्द्रजी, यह पर्वत, यह आकाश, यह जगत् और यह मैं-इत्यादि सब कुछ चिन्मय आत्मा ही…
- Verses 41–43इस तरह सब कुछ चिन्मय आत्मा ही भासता है, कोई दूसरा नहीं, यह प्रबुद्धात्मा ही देखता है, अप्…