Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
स्वयं स्वप्नान्वितोऽन्यस्य स्वप्नपुंस्त्वं गतो नरः ।
स्वप्नेऽज्ञानप्रबुद्धस्य यादृक्तादृक्स्वरूपतः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि यह व्यवहार स्वप्नरूप ही हैं, तो फिर वहाँ अपनी या दूसरे किसी की जाग्रतअवस्थारूपता
का प्रतिभास केसे होता है ? इस पर कहते हैं /
जैसे स्वप्न में ही, अज्ञानवश “में स्वप्न से जग गया" ऐसा जान रहे किसी अन्य पुरुष के
स्वप्नदृश्य पुरुषरूपता को प्राप्त हुआ स्वप्नयुक्त पुरुष स्वयं अपने को स्वरूपतः जैसा 'मैं प्रबुद्ध
हू, ऐसा प्रतिभासित होता है, ठीक वैसा ही वह व्यवहार है