Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
स्वप्नस्थानां शिरश्छिन्नं येषां ते संसृतौ स्थिताः ।
कालेन ज्ञानलाभेन विना कुर्वन्तु किं किल ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न में स्थित जिन पुरुषों का
सिर कट चुका है वे स्वप्न-संसार में स्थित होकर ज्ञान के बिना क्या कर सकते हैं, ऐसे ही संसार
में स्थित जीव कालवश ज्ञानप्राप्ति के बिना क्या कर सकते हैं ? अर्थात् ज्ञानप्राप्ति के पहले क्या
कर सकते हैं । इसलिए स्वप्न में आहत हुए पुरुषों का जागरण के उपायभूत देह के न रहने से
अगत्या यही कहना पड़ता है कि स्वप्न में ही उनकी जागरणता है