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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verses 41–43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, verses 41–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

पश्यत्येतत्प्रबुद्धात्मा नाप्रबुद्धः कदाचन । श्रोतुः कथार्थसंवित्तिर्नाश्रोतुर्भवति क्वचित् ॥ ४१ ॥ अप्रबुद्धमिति भ्रान्तिरेवेयं सत्यतां गता । क्षीबस्य सुस्थिरा एव नृत्यन्ति तरुपर्वताः ॥ ४२ ॥ सर्वत्राप्रतिहतमेकरूपबोधं प्रत्यक्षं शिवमनुबुध्य चित्स्वरूपम् । प्रत्यक्षान्तरमिह पेलवं श्रयन्ते ये मूढास्तृणतनुभिः शठैरलं तैः ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह सब कुछ चिन्मय आत्मा ही भासता है, कोई दूसरा नहीं, यह प्रबुद्धात्मा ही देखता है, अप्रबुद्धात्मा कभी नहीं देखता । हे श्रीरामजी, महाभारत आदि कथा का अर्थज्ञान सुननेवाले को ही होता है, जो कथा नहीं सुनता उसको उसका अर्थज्ञान भी कभी नहीं होता