Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
यत्सुखं दुःखमेवाहुः क्षणनाशानुभूतिभिः ।
अकृत्रिममनाद्यन्तं यत्सुखं तत्सुखं विदुः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
ङी तरह योगियों के अनुभवश्तिद्ध सर्वसाधारण जो छख है उसी में परमपुरुषार्थक्पता जाननी
चाहिए, पामरजनप्रस्िद्ध में नहीं; इस आशय से कहते हैं /
क्षणभर में ही नाश के अनुभव से तत्त्वज्ञानी महानुभाव लोग जो विषयसुख है उसको दुःखरूप
ही कहते हैं तथा अकृत्रिम, अनादि,अनन्त जो सुख है उसी को वास्तविक सुख बतलाते हैं