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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

योधः कालेन भवति महामोहवतामपि । यस्मान्न किंचनाप्यस्ति ब्रह्मतत्त्वादृतेऽक्षयम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए यूलअज्ञानरुपी निद्रा के उच्छेद से स्वरूप का प्रतिबोध ही इस जीवका युख्य प्रतिबोध है / इसके विपरीत तो यही कहना पड़ेगा कि स्वप्न में ही व्यर्थ जागरण का अभिमान है, यह कहते हैं। इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, महामोहशाली (अज्ञानरूपी निद्रायुक्त) पुरुषों को जो समय पाकर बोध होता है यानी ज्ञानरूप जागरण होता है वही उनका मुख्य प्रबोध है - जागरण है, क्योंकि ब्रह्मतत्त्व के सिवा कोई दूसरा अक्षय पदार्थं जागरण या स्वप्न में नहीं है