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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 68, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

विद्याधर्युवाच । ततः प्राचीनमभ्यासं बोधधारणयामले । कुर्वः प्रकटतां तेन जगदेष्यति शैलगम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

विद्याधरी ने कहा : हे भगवन्‌, चूँकि दृढाभ्यास नामक समाधिरूप यत्न के बिना देहादि मेँ आधिभौतिकता की (स्थूलता की) भ्रान्ति निवृत्त नहीं हो सकती ओर आतिवाहिक भावका भी (सूक्ष्मभावका भी) आविर्भाव नहीं हो सकता । आतिवाहिक भाव के बिना दूसरे सर्ग की स्थिति भी संक्षिप्त प्रत्यक्ष से नहीं देखी जा सकती, इसलिए निर्मल परमात्मा में सर्वबोधानुकूल समाधिरूप धारणा से अपना हम प्राचीन आतिवाहिक भाव का अभ्यास पुनः करे, उसी उपाय से शिला के अन्तर्गत जगत्‌ प्रकट होगा, जिसका मैंने आपसे वर्णन किया है

सर्ग सन्दर्भ

सड़सठवाँ सर्ग समाप्त अडसठवाँ ~ ु सर्ग आधिभौतिक भ्रान्ति का निरास करके समाधि से जो आतिवाहिक भाव की स्थिति होती है, वह सत्य है ।