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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 208

21 verse-groups

  1. Verse 1ढो सौ छठवाँ सर्गे समाप्त दोसौ सातवाँ सर्ग पूर्व सर्ग में राजा प्रज्ञप्ति द्वारा किये गये…
  2. Verse 2सर्वप्रथम स्वयंप्रमाण स्व स्व संवेदन का अनुसरण करनेवाले पुरुषों को पदार्थों के तत्त्व की…
  3. Verse 3है उस विषय का वह रूप अवश्य होता ही हे । वह सत्‌ हो अथवा असत्‌ हो इस विषय में आग्रह नहीं है
  4. Verse 4संवित्‌ का ऐसा स्वभाव ही है । उक्त संवित्‌ द्वारा आत्मरूप मेँ शरीर की पहले भावना की जाती…
  5. Verse 5इसीलिए लोग स्वप्न ओर जाग्रत में देह का चेतयिता के (आत्मा के) रूप में ही अनुभव करते हैं अन…
  6. Verses 6–7आदि के तीन प्रश्नों का भी इसी तरह समाधान करना चाहिये, क्योकि जगत्‌ की सिद्धि स्वेदन के बल…
  7. Verse 8इस प्रकार सदा एकरस (कभी विकृत न होनेवाले) ब्रह्म की जगत्रूप से स्थिति होने के कारण जगत्‌…
  8. Verses 9–12जगत्‌ नित्य संविन्मात्र ही है, यह बात सब प्राणियों की बुद्धि में बद्धमूल है, दृढ़ अनुभव स…
  9. Verses 13–14जो मूढ़बुद्धिवाला चार्वाक यह प्रपंच एकमात्र प्रत्यक्ष प्रमाणवाला ही है, प्रत्यक्षातिरिक्त…
  10. Verse 15चार्वाक आदि की उक्ति से सन्देहो की कदापि निवृत्ति नहीं हो सकती, क्योकि अनुमान आदि प्रमाणो…
  11. Verse 16यदि प्रत्यगात्मसंवित्‌ ही देहादि जगत्‌ है तो शव (मृत शरीर) भी संवित्‌ होने से क्‍यों नहीं…
  12. Verse 17जैसे तुम्हारा स्वप्ननगर विस्तृत होता है वैसे ही हिरण्यगर्भ के वेष धारण किये हुए परमब्रह्म…
  13. Verses 18–19यद्यपि यह सम्पूर्ण जगद्‌-भान वास्तव में निरन्तर चिन्मात्रस्वरूप ही है तथापि इसमें जैसे तु…
  14. Verse 20वैसे ही जगत्‌ मेँ भी चिन्मयता की संभावना करनी चाहिये, ऐसा कहते है। ब्रह्म संविदाकाशमय है,…
  15. Verses 21–22जैसे तुम्हारे संकल्पनगर में तुमसे जिस-जिस पदार्थ का जैसा संकल्प किया जाता है वैसा ही तुम्…
  16. Verse 23इसलिये जैसे जीवित देह की चेष्टा होती है, मृत शरीर की चेष्टा नहीं होती । यों नियत इन स्पन्…
  17. Verses 24–27है वैसे ही निष्कारण चिन्मात्र उन्मेष जगत्‌ के रूप में भासता हे
  18. Verse 28इससे माता पित्राद्यमावो5पि' इस प्रश्न का भी समाधान हो गया, ऐसा कहते हैं। शरीर हो चाहे मत…
  19. Verses 29–31मरण के पश्चात्‌ जगत्‌ के दर्शन में भी यही न्याय जानना चाहिये, ऐसा कहते हैं। जैसे चिदाकाश…
  20. Verses 32–36इसी तरह तत्त्वज्ञानी के विषय में जगत्‌ भी नहीं व्याप्त होता है, ऐसा कहते है। स्पष्टरूप से…
  21. Verses 37–38उक्त भ्रान्ति मोक्ष के उपायभूत अध्यात्मशास्त्रों के परिशीलन आदि से ही पूर्णरूप से नष्ट हो…