Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verses 37–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 37,38
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
उक्त भ्रान्ति मोक्ष के उपायभूत अध्यात्मशास्त्रों के परिशीलन आदि से ही पूर्णरूप से नष्ट होती है
उसके विनाश का दूसरा मार्ग नहीं है, ऐसा कहते है ।
मोक्ष के उपायभूत श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि का अनादर करनेवाले पुरुषों का यह मोह
(अज्ञान) कदापि शान्त नहीं होता हे। बोध होने से वासना के मिट जाने पर यह मोह नष्ट हो जाता हे ॥ ३ ६॥
इससे धर्म ओर अधर्मा ही जगत् के आकार मे परिणत होते है यह आस्तिक लोगों का पक्ष भी
अनुगरहीत हुआ, इस आशय से कहते है।
अप्रबुद्ध पुरुष की जो संवित् है वह धर्म-अधर्मवासना है जो आकाश मेँ ही आकाशरूप भासती है
वही यह जगत् के रूप में स्थित हे । जगत् का स्वरूप स्वतः शून्यरूप भी नहीं है और सत्स्वरूप भी नहीं
है, किन्तु ब्रह्मनाम का चैतन्य ही जगत्स्वरूप है ओर अज्ञान के कारण ही अनर्थभूत है तत्त्वज्ञानी पुरुष
के लिए तो परमकल्याण निरतिशय आनन्दरूप ही हे