Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
तदनावरणस्यास्य योजनानां शतेष्वपि ।
युगैरपि स्वप्न इव कार्यकृद्वर्तमानवत् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि प्रत्यगात्मसंवित् ही देहादि
जगत् है तो शव (मृत शरीर) भी संवित् होने से क्यों नहीं चेतता यानी चैतन्य प्राप्त करता है ? ऐसी
जिसकी शंका है उस मूढ श्रोता के लिए यहो पर कहा जाता है, तुम सुनो