Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verses 9–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, verses 9–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 9-12
संस्कृत श्लोक
चिद्रूपब्रह्मसंकल्पवशादेवैतदङ्ग सत् ।
चिदुन्मेषनिमेषौ यौ तावेतौ प्रलयोदयौ ॥ ९ ॥
राजोवाच ।
किं नोपलभ्यते पूर्वं किं पश्चादुपलभ्यते ।
जगच्चलद्वपुरिदं सुस्थिरारम्भभास्वरम् ॥ १० ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अस्मिंश्चिद्व्योमसंकल्पपुरस्थे भाव ईदृशः ।
यद्भूत्वा न भवत्येव पुनर्भवति च क्षणात् ॥ ११ ॥
बालसंकल्पपुरवद्व्योमकेशोण्ड्रकादिवत् ।
किलैते सदसद्रूपा भान्ति सर्गाश्चिदात्मनि ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् नित्य संविन्मात्र ही है, यह बात सब
प्राणियों की बुद्धि में बद्धमूल है, दृढ़ अनुभव से सिद्ध है, नित्य संविदात्मा ही सत्तारूप से सर्वत्र पूर्ण
है तथा महात्माओं ने अनेक बार यह कहा है फिर भी जगत् की नित्य संविन्मात्रता का अपलाप करके
अन्धकूप के मेढक जैसे जो मूढ पुरुष आपाततः वर्तमान नाम और रूप के अनुभव को ही प्रमाण
मानकर संवित् नित्य नहीं है, किन्तु उसका कारण शरीर ही है वह जड़ोपादान तथा जडात्मा की
गुण है यों मोह को प्राप्त हुए हैं वे नैयायिक, चार्वाक आदि अज्ञ उन्मत्त ही हैं । वे हम लोगों की
ज्ञानचर्चा में भाग लेने के योग्य नहीं हँ । भले चंगे मस्तिष्कवाले पुरुषों तथा पागलों का एवं मूढ तथा
प्रबुद्धो का परस्पर संलाप (संवाद) कैसा ? किसी भी प्रकार उसका संभव नहीं है । जिस विद्वान् के
कथनोपकथन से सकल सन्देहो का विनाश न हो उसे इस लोक में क्या अन्य लोकों में क्या यानी
तीनों लोकों में मूर्ख-कथा ही समझना चाहिये