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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verses 18–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

यथा मणौ प्रकचति प्रोन्मज्जननिमज्जने । परावर्तः स्वभासास्य चिन्मणौ जगतां तथा ॥ १८ ॥ विधीनां प्रतिषेधानां लोकसंस्थाप्रयोजनम् । सैव संविदि रूढत्वात्प्रेत्यापि फलदा स्थिता ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि यह सम्पूर्ण जगद्‌-भान वास्तव में निरन्तर चिन्मात्रस्वरूप ही है तथापि इसमें जैसे तुम्हें अपने स्वप्ननगर में चेतन भ्रान्ति नहीं होती वैसे ही शवादि जड़ में भी नहीं होती है यह जानना चाहिये। अपने स्वप्न में दसों दिशाएँ, विविध पर्वत, पृथिवी आदि, नगर आदि सब कुछ चिन्मय आकाश ही हैं यह विचार करने पर तुम्हारे अनुभव से सिद्ध हे