Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verses 21–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 21,22
संस्कृत श्लोक
यथा तु द्रष्टृदृश्यत्वात्कल्पना कल्पनापुरम् ।
स्वयं जगदिवाभाति जातमित्युच्यते तथा ॥ २१ ॥
यदा स्वभावात्कचनं संहृत्यात्मनि तिष्ठति ।
ब्रह्मचिद्गगनैकात्मा शान्त इत्युच्यते तथा ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तुम्हारे संकल्पनगर में
तुमसे जिस-जिस पदार्थ का जैसा संकल्प किया जाता है वैसा ही तुम्हें उसका अनुभव होता है वैसे ही
ब्रह्मा के संकल्पनगररूप इस जगत् में चित् द्वारा जिस जिस का जैसा संकल्प किया जाता है उस
उसका वैसा अनुभव होता हे जैसे तुम्हारे संकल्पनगर में जिस-जिस पदार्थ का जैसे संकल्प किया
जाता है उस समय वह वैसा रहता ही है वैसे ही इस संकल्पनगर में जिस जिसका जैसे संकल्प किया
जाता है वह उस समय वैसा रहता ही है