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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मसंकल्पनगरं जगत्तावदिदं स्थितम् । यद्दृश्यं दृश्यबोधेन ब्रह्मैव ब्रह्मबोधतः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वप्रथम स्वयंप्रमाण स्व स्व संवेदन का अनुसरण करनेवाले पुरुषों को पदार्थों के तत्त्व की व्यवस्था करने में कहीं भी किसी भी सन्देह की उपपत्ति नहीं होती है, ऐसा कहते हैं। सभी जगत्‌ के पदार्थ सदा ही असद्रूप हैं और सदा ही ये सद्रूप हैं, क्योंकि इनकी स्थिति संवेदन के अनुसार है। जहाँ पर जिसके अस्तित्व की प्रतीति होती है, जहाँ पर जिसके नास्तित्व की प्रतीति होती है वहाँ दोनों ही स्थलों में भगवती संवित्‌ द्वारा ही उनके अस्तित्व और नास्तित्व रूपका समर्थन किया जाता है, यह भाव है