Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
कचनाकचने यस्य स्वभावो निर्मलोऽक्षयः ।
यथैतावात्मनो नान्यौ स्पन्दास्पन्दौ नभस्वतः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिये जैसे जीवित देह की चेष्टा होती है, मृत
शरीर की चेष्टा नहीं होती । यों नियत इन स्पन्द (चेष्टा) ओर अस्पन्द (चेष्टा का अभाव) दोनों की
हिरण्यगर्भरूप चित् ने ही कल्पना की है वैसे ही उसने उनका स्वयं अनुभव किया इसलिये शव में चेतना
की अभिव्यंजक चेष्टा की प्राप्ति नहीं होती हे