Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
एवमस्मिन्गृहे याते संपन्नैवमियं प्रजा ।
एवं संकल्पसंपन्ने जगत्येवं भवत्यलम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
संवित् का ऐसा स्वभाव ही है । उक्त संवित् द्वारा आत्मरूप मेँ शरीर की पहले भावना
की जाती है ओर संवित् की देहधर्मता यों विपरीतता का अध्यास किया जाता है । उस देह से उस
संवित् की अभिव्यक्ति होती है यानी देह की आत्मता | इस प्रकार नरक और स्वर्गा के भोग के लिए
देह के उत्पादक माता-पिता आदि से शून्य प्रदेश में देह के प्रति कौन उपादान कारण है और कौन
निमित्त आदि कारण हैं ? प्रज्ञप्ति के इस प्रश्न का समाधान किया गया