Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 208, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 208 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
शुभाशुभं यथोदेति प्रजानां गृहसंगमे ।
असंबद्धैरप्रतिघैर्दूरस्थैस्तदिदं श्रृणु ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
ढो सौ छठवाँ सर्गे समाप्त
दोसौ सातवाँ सर्ग
पूर्व सर्ग में राजा प्रज्ञप्ति द्वारा किये गये प्रश्नों के कतिपय
प्रश्नों का क्रम तथा व्युत्क्रम से श्रीवसिष्ठजी द्वारा समाधान |
एक विज्ञान से ही सर्व विज्ञान होता है, अतः सकल सन्देहो का मूलोच्छेद द्वारा परिहार होने के
कारण मैं सामान्यरूप से सब प्रश्नों का समाधान करूँगा, यों श्रीवसिष्ठजी प्रतिज्ञा करते हैं।
हे राजन्, जिस प्रकार मैं हथेली में रक्खे आँवले की तरह स्पष्टरूप से आत्मतत्त्व का प्रतिपादन
करता हूँ उसे तुम सुनो । जिससे तुम्हारे सकल सन्देह सर्वथा पूर्णरुप से निर्मूल हो जायेंगे