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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 20

उन्नीसर्वोँ सर्ग समाप्त (८) इसमें “चन्द्रमा मनसो भूत्वा हृदयं प्राविशत्‌" यह श्रुति प्रमाण है ।

18 verse-groups

  1. Verse 1(७) ब्रह्मा आदि के शरीर भी चन्द्ररूपी अमृत के परिणाम ही हैं । देखिये इस विषय में श्रुति क…
  2. Verse 2चूँकि ब्रह्म पूर्व की उपासना से मिश्रित वासना से सृष्टि के आरम्भ में पंचभूतात्मक विराट्‌…
  3. Verse 3अतः मिट्टी आदि हेतुओं से उत्पन्न सकोरे आदि मिट्टी के स्वभाव से ही ओत-प्रोत रहते हैं, यह द…
  4. Verse 4जैसे विराट्‌ पुरुष (समष्टिजीव) समस्त जगत्‌ का निर्माण करता है, वैसा ही व्यष्टिजीव भी अपने…
  5. Verse 5भद्र, तुच्छ से तुच्छ कीटादि तक और बड़े से बड़े रुद्र तक इस तरह का जगत्‌-रूपी भ्रम जो उत्प…
  6. Verse 6ऐसा भले ही हो, इससे प्रक्रत मे क्या आया ? इस पर कहते हैं / कीट तक और रुद्र तक जितने व्यष्…
  7. Verse 7जैसे विराट्‌ आत्मा में इस समस्त जगत्‌ का विस्तार कल्पनावश हुआ है, वैसे ही सभी इन मच्छर आद…
  8. Verse 8भद्र, परमार्थतः न स्थूल है और न कुछ कहीं सूक्ष्म ही है, परन्तु भ्रान्ति से जहाँ कहीं जो क…
  9. Verse 9व्यष्टियन और व्यष्टिमन से उपहित जीव - इन दोनों का तो विराट्‌ कारण है, अतः उनकी समानता केस…
  10. Verse 10इस तरह उयाधिरूप मन की कारणता का निस कर अब उपहितजीव के प्रति कारणता का निरास करने के लिए उ…
  11. Verse 11उसी ब्रह्म के आभासरूप आनन्द का, जो शुक्रयुत जीवात्मक चैतन्य में स्थित्‌ है, वीर्यरूप स्वभ…
  12. Verse 12अनन्तर यह जीव चिति उस वीर्य में पंचभूतात्मक देहरूपता को धारण करती है, यही इसकी उपहितता है…
  13. Verse 13यदि उपाधियुक्त स्वरूप में कड भी कारण नहीं है, तो वह जीवों का अनायन्दुक स्वरूप स्वभावरूप ह…
  14. Verse 14यदि स्वशब्द का अर्थ उपाधि से युक्त आत्मा मान लिया जाय, तो भी यह स्वशब्दार्थ से परथक्‌ भाव…
  15. Verse 15यदि नित्य या अनित्य स्वभावभत जीवस्वरूप नहीं है तब वह हैं क्या चीज, जो ससार में फँस जाती ह…
  16. Verse 16जगत्‌ के रूप में वर्धित अविद्याशक्ति के प्रभाव से तिरस्कृत अतएव अपनी एकता की द्रैतरूप में…
  17. Verse 17इस्रीलिए विद्या से अविद्या का विनाथ सम्भव होने के कारण अनिर्मोक्ष दोष नहीं आ सकता, यह कहत…
  18. Verse 18इसलिए हे श्रीरामजी, सबसे पहले आप अज्ञानरूप घनमेघ से छुटकारा पाये हुए चैतन्य प्रकाशरूप बन…