Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
नीहारेणेव संवीतश्चेत्यवस्तुपरायणः ।
जात्यन्ध इव पन्थानं मारुतात्मा न पश्यति ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि नित्य या अनित्य स्वभावभत जीवस्वरूप नहीं है तब वह हैं क्या चीज, जो ससार
में फँस जाती हैं 2 यदि यह कड प्रश्न करे, तो इस प्रश्न का उत्तर यही हैं कि वह चीज
अनिर्वचनीय अज्ञान से आवृत बह्म ही है यानी अपने विपरीत स्वरूप का अवलोकन ही उक्त
चीज है ओर यही संसार में फँसती है, यह कहते हैं /
जैसे कुहरे से आच्छादित वस्तु का स्वरूपतः ज्ञान न होकर विपरीत ज्ञान होता है, वैसे ही नीहार
के सदुश स्वरूप-आच्छादन करनेवाले अज्ञान से आवृत आत्मा का भी स्वरूपतः ज्ञान न होकर जो
विपरीत अवलोकन है, वही जीव का स्वरूप है, इसी से विषयात्मक वस्तुओं की ओर उसकी प्रवृत्ति
झुकी हुई रहती है । जड़ इन्द्रिय आदिरूप अपने को मानकर जैसे जन्मान्ध पुरुष मार्ग को नहीं देखता,
वैसे ही वह अपने स्वरूप को नहीं देखता